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इन तीन दोस्तों ने 14 बार फेल होने के बाद बनाया Facebook का इंडियन वर्जन


फरीद अहसन, भानू प्रताप, अंकुश सचदेवा ने अपने 14 प्रोजेक्ट में फेल होने के बाद Facebook का इंडियन वर्जन शेयरचैट को बनाया. आइए जानें इसकी कहानी…

फरीद अहसन, भानू प्रताप, अंकुश सचदेवा ने अपने 14 प्रोजेक्ट में फेल होने के बाद Facebook का इंडियन वर्जन शेयरचैट को बनाया. आइए जानें इसकी कहानी…

देश में आजकल शेयरचैट तेजी से हिट हो रहा है. शेयरचैट को 10 भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे एक्सपर्ट्स इंडिया का फेसबुक बता रहे हैं. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इसको बनाने वाले तीन दोस्त 14 प्रोजेक्ट पर काम कर चुके थे, लेकिन उनमें से एक भी नहीं चला. शेयरचैट के फिलहाल देशभर में 40 लाख एक्टिव यूजर्स हैं. इस पर रोजाना 2 लाख पोस्ट डेली शेयर की जाती हैं.

शेयरचैट को जानिए- शेयरचैट की शुरुआत साल 2015 में हुई थीशेयरचैट एंड्रायड ऐप है जो 10 भारतीय भाषा में है. इस पर आप भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी भाषा में पोस्ट शेयर कर सकते हैं. उनके करीब 40 लाख एक्टिव यूजर्स हैं जो रोजाना 2 लाख पोस्ट डेली शेयर करते हैं. (ये भी पढ़ें-50 हजार से शुरू करें CCTV कैमरे का बिजनेस, होगी लाखों में कमाई)

ऐसे हुई शुरुआत- इसे 3 दोस्तों ने मिलकर शुरू किया. 25 साल के फरीद ने आईआईटी में साथ पढ़े अपने दोस्त भानु सिंह और अंकुश सचदेवा के साथ इसे शुरू किया. शेयरचैट में भानू प्रताप सिंह सीटीओ, फरीद अहसाान सीईओ और अंकुश सचदेवा चीफ प्रोडक्ट ऑफिसर की पोस्ट पर हैं. अब शेयर चैट के पास 50 लोगों की टीम है, जिसमें से 18 डेवलपर्स हैं. शेयरचैट का ऑफिस बेंगलुरु में है. उन्होंने शेयरचैट साल 2015 में शुरू किया था.(ये भी पढ़ें-बिजनेस के लिए इन कंपनियों से ले सकते हैं लोन, आइडिया पसंद आने पर देती हैं पैसा)मेरठ के मनु जैन को Xiaomi ने बनाया 320 करोड़ का मालिक, जानिए उनके बारे में…

इससे पहले इनके 14 प्रोजेक्ट हुए फेल- इन तीनों को फोर्ब्स ने अंडर 30 लिस्ट में शामिल किया. वह तीनों बीतें छह साल से काम कर रहे हैं. वह पहले बिजनेस पार्टनर बने और उसके बाद उनकी दोस्ती बढ़ी. उन तीनों ने एक साथ 17 प्रोजेक्ट पर काम किया जिसमें से 14 फेल हो गए. 15वें प्रोजेक्ट पर उनका एक प्लान चल निकला. VIDEO: इन दोस्तों ने अपने गांव को बनाया स्मार्ट, अब इसी के जरिये कर रहे कमाई)

ऐसे मिला आइडिया- चैट फाइट के दौरान उन्हें 32,000 ऐसे लोग मिले जो सिर्फ अपनी लोकल लैंग्वेज में चैट करना चाहते थे. उन्होंने देखा कि मिदनापुर में रिटायर्ड प्रोफेसर एक ऐसी दुनिया ढूंढ रहे थे जहां वह अपनी भाषा में कम्यूनिकेट कर सके. उनके जैसे लाखों की संख्या में लोग थे जो अपनी भाषा में बात करना चाहते थे. इंडिया में लोकल लैंग्वेज के प्लेटफॉर्म की डिमांड भी बढ़ रही है.(ये भी पढ़ें-इन बहनों ने ऑनलाइन सीखा जूलरी बनाना, अब घर पर बैठकर करती हैं बिजनेस)

जियो से मिला फायदा-जियो के शुरूआत मे फ्री डेटा और सस्ते एंडरॉयड फोन के आने से इंटरनेट की दुनिया में पहली बार आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है. रूरल और सेमी अर्बन लोगों के लिए लोकल लैंग्वेज में कंटेंट उपलब्ध नहीं था और इस ग्रुप में लोकल लैंग्वेज की डिमांड लगातार बढ़ रही थी. तब 2014 में उन्होंने इंगलिश भाषा को ही हटा दिया. वह यूजर जेनरेटेड कंटेट सिस्टम बनाने लगे.

छोटे शहरों में है ज्यादा शेयरचैट के यूजर्स-अभी उनके 70 फीसदी से ज्यादा यूजर्स12 से 25 साल और 70 साल से अधिक उम्र के हैं. इनमें से 86 फीसदी आबाजी टियर II और टियर III शहरों से है. उनका 5 फीसदी ऑडियंस बांग्लादेश, कनाडा और दुबई में भी है. रोजाना उनके करीब 35 लाख कंटेंट व्हाट्ऐप पर भी शेयर होते हैं.(ये भी पढ़ें-मामूली फीस देकर बनें मॉडर्न टीचर, 3 घंटे पढ़ाकर कमाएं 40 हजार/महीना)








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