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कहानी: पतिदेव और मिश्राजी में ताज़ा अख़बार पाने की होड़ लगी थी, जिस रेज में मुझे दौड़ना पड़ रहा था लेकिन पड़ोसी धर्म निवारण भी तो ज़रूरी था


  • हिंदी समाचार
  • मधुरिमा
  • पतिदेव और मिश्राजी नवीनतम समाचार पत्र प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, जिस दौड़ में मुझे दौड़ना था, लेकिन पड़ोसी धर्म का पालन करना भी आवश्यक था।

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मीता एस ठाकुर4 घंटे पहले

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  • रोज़ सुबह अख़बार पढ़ा हुआ मिलता था। कोई अख़बार से भला क्या चुरा सकता था, लेकिन ताज़गी चला जाता था। तफ़्तीश से जो पाया वो अपहरण करने का मौका तो दे गया लेकिन तब तक ठीक रहा।

सुबह-सुबह मेरी आवाज़ सुन कर मेरी नींद खुली। ‘संडे को भी लोगो को चैन नहीं है।’ बिस्तर से बेमन उतरते हुए मैं बड़बड़ाई। उनींदी आँखें को पूरा खोलने की कोशिश के साथ मैनें देखा कि पतिदेव वाचमैन पर बरस रहे थे। ‘आखिरकार ये न्यूज़पेपर चला गया कहां जाता है, ..? कभी कभी तो एडिशनल पेपर भी गायब रहते हैं, क्यों पेपर की तह बेतरतीब होती है। आज का अख़बार 2 दिन बासी लगता है। अगर कल से न्यूज़ रूम ताज़ा और समय से नहीं मिला तो आपकी खैर नहीं। ‘ बेचारा वाचमैन क्या कहता है, जी-साहब कह कर चलते हैं। वॉचमैन को डपट कर पतिदेव वापस पलटे तो चेहरे पर खीज़ के भाव थे। उनकी आदत है सुबह उठ कर चाय की चुस्की के साथ अ’खबर की हर ख़बर के ज़ायके लेने की। अख़बार तो जैसे मठरी टोस्ट या अदरक इलाइची हो गई, जो चाय के साथ और चाय में होना ज़रूरी होता है।]भन्नाते हुए पतिदेव अख़बार उठा कर पढ़ने तो लगी पर जो आनंद ताज़े अख़बार में आता है, उसे वंचित रह गए। सही है तो जो मज़ा अख़बार के पन्नों में सिर घुसा कर ख़बरों में खो जाने का है, वो मज़ा और कहीं नहीं। ताजा अख़बार होता ही है नए कपड़े की तरह, एक दम कड़क और चमकदार। ताज़े अख़बार के पन्नों की महक ही अलग होती है। ख़बरें तो वही रहेंगी, पर किसी और का पढ़ा अख़बार बासी लगने लगता है। कुल मिला कर मैं जनाब के दिल का हाल समझ गया था। पर अब सवाल ये था कि इस ताज़े अख़बार की तह खोल कर, उसको बेतरतीब कर उसकी महक को उड़ा कर बाबा कौन कर देता है? अगाथा क्रिस्टी के कुछ नॉवेल तो पढ़े ही रखे गए थे, इसलिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी चाहिए पड़ी जासूसी करने में। अलसुबह उठ कर एक मुस्तैद जासूस की तरह मैं की-हो पर नज़रें गड़ा कर बैठी रही। कुछ ही देर में मैंने देखा कि बगल वाले मिश्रा जी ने बड़े हक़ से सामने टेबल पर रखे अख़बार को उठाया और जा रहे थे। अगले लगभग 4-5 दिनों तक मेरी जासूसी यूं ही चलती रही, हर दिन की-होल से मुझे मिश्रा जी के ही दर्शन होते हैं। अब क्या करूं … मैं सोचने लगा। अब सुबह-सुबह उठ कर कर अख़बार उठाने और अंदर लाने के अलावा कोई चारा नहीं था। पर पर्यत याद रखना है, इसलिए सबसे पहले अख़बार उठाना चाहिए। पतिदेव भी अख़बार में लगभग 8 बजे ही पढ़ते हैं। ख़ैर, ये हल निकाला गया कि धर्मसंकट से बचना है तो अलसुबह ही उठो और इससे पहले की मिश्रा जी अख़बार पर हाथ साफ करें, उसे उठा कर ला लो भीतर। अब ये काम भी मेरे मत्थे ही पड़ गए, क्योंकि स्कूल जाने की तैयारी के लिए मुझे भी इसी तरह अलसुब उठना पड़ा है। बस फिर क्या था, मिश्रा-जी और मुझेमेंट एक अनदेखी और अनकही सी स्पर्धा होने लगी। कभी मैं अख़बार पहले लेती तो कभी ‘मिश्रा जी।’ अगर अख़बार पहले मेरे हाथ लगता है तो मुझे जीत का अहसास होता है और गर पहले उन्हें मिल जाता है तो शायद उन्हें भी ऐसा ही लगता है। ख़ैर कई दिनों तक ऐसा ही चलता रहा, वह दिन लद गया जब आराम से बिस्तर छोड़ जाता था, अब तो आंखें भी पूरी तरह से नहीं खुलती पातीं और दौड़ लगाने पड़ती थी। मेरी मुसीबत भांप कर पतिदेव बोले ‘मैं मिश्रा जी से बात कर लेता हूं, और पेपर हॉकर का नम्बर भी दे देता हूं, उन्हें कहेगा कि वे भी पेपर लेते आरम्भ कर दें।’ मैंने पतिदेव को छेड़ते हुए कहा, ‘जनाब ऐसा है कि आप बासी अख़बार पढ़ने की आदत डाल लें, क्योंकि मिश्रा जी ठहरे सीनियर सिटीज़न। आप उनसे जुड़ नहीं सकते और न ही सख़्त रवैया अपना सकते हैं। ‘ उसी दिन शाम को मिश्रा जी घर पधारे। वो कॉलेज में प्रोफ़ेसर रह चुके थे, इसीलिए मैं उन्हें ‘सर’ कहा करता था। जाने क्यों उन्हें देखकर मुझे अपने पति का फांसी चेहरा याद आ गया और मैंने शरारत से पतिदेव की तरफ देखा। फिर मिश्रा जी का अभिवादन करते हुए कहा, ‘आइए सर, बैठिए, अभी भी चाय लाती हो।’ वे बड़े आराम से बैठे, पतिदेव की शक्ल देखकर ही बन रहे थे। चाय की चुस्कियों और गरमा-गरम पकौड़ियों के साथ बातचीत का दौर शुरू हुआ। पतिदेव भी अब सामान्य हो गए थे, गोया अपने दिल को समझा लिया हो उन्होंने कहा। इधर उधर की बातों के पश्चात मिश्रा जी बोले, ‘सिंह-साहब, अंत में पड़ोसी जिनमें व्हेली हैं, सुख-दुःख बांटने के लिए न। आजकल तो देखिए पड़ोसी धर्म ख़त्म सा हो गया है। सब कितने दुखहीन हो गए हैं। मुझे तो ख़ुशी है कि मैं आपका पड़ोसी हूँ। अब देखिए न मैं रोज़ आपका अख़बार पढ़ता हूँ, पर आपने मुझे कभी रोका-टोका क्या है? न न। यही कारण है कि पड़ोसी धर्म है। जैसा कि लोगों की तनख़्वाह है, उतनी तो मेरी पेंशन आती है, मैं अख़बार क्या पूरा प्रिंटिंग प्रेस ख़रीद लूं, पर मुझे तो इसी में मज़ा आता है। ‘ उनकी बातें सुन कर और पतिदेव के चेहरे के भाव देख कर मेरे पेट मे बल पड़ने लगे, हंसी रोकते हुए मेरा चेहरा लाल हो गया, पर बात अभी ख़त्म नहीं हुई थी, मिश्रा जी पतिदेव के कंधों पर हाथ रखते हुए बोले, ‘सिंह- साहब, मैं रिटायर्ड आदमी हूं, जहां दो पैसे बचेंगे, ज़रूर बचाऊंगा। ‘ ऐसा कहते हुए उन्होंने एक पकौड़ा और मुंह के हवाले करते हुए अपनी बात आगे जारी रखी, ‘सच में सिंह-साहब आप जैसा पड़ोसी किस्मत से मिलता है।’ उधर पतिदेव जी ‘हां, सही कहा, ठीक कह रहे हैं, जैसे रटे-रटाये जुमले बोलते रहते हैं, और मिश्रा-जी के साथ पड़ोसी धर्म निभाते रहे, पर दिमाग से ताज़ा अख़बार पढ़ने का मोह नहीं छोड़ पा रहे थे, तारीफफ़ाद के ख़्याल। के नीचे दबे हुए थे सो अलग। कुछ देर बाद जब मिश्रा जी चले गए तब हम उनकी बातों को दोहराते हुए हंसे और सचमुच हंस कर बहुत हल्का लगा। उसी स्वार्थ से ही सही, पड़ोसी धर्म तो संभाल रहा था, और शुद्धताता भी रहना चाहिए। हम समझ चुके थे कि अख़बार को पाने की ये चूहा दौड़ चलती रहेगी और पड़ोसी धर्म भी अपनी जगह कायम रहेगा, कभी मिश्रा जी के हाथों अख़बार का उद्घाटन होगा, कभी मेरे हाथों।

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