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किंवदंती: अपने काम को जोर मानकर करेंगे तो कभी भी सुख-शांति नहीं मिलेगी, जिम्मेदार लोग प्रसन्न होते हैं


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3 घंटे पहले

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  • एक राज्य में अकाल पड़ा तो राजांच हो गया, अकाल के बाद हालात सामान्य हुए तो शत्रुओं की चिंता बढ़ने लगी, परेशान राजा को अपने एक सुखी सेवक से जलता था

एक राजा के राज्य में अकाल पड़ा तो राजा का राजकोष खाली होने लगा। प्रजा से लगान नहीं मिल रहा था और खजाने में ज्यादा धन नहीं बचा था। इस बात से राजा बहुत दुखी रहने लगा था। कुछ समय बाद हालात सामान्य हुए। लेकिन, राजा की कमाई नहीं बढ़ रही थी।

राजा के शत्रु भी उसके राज्य पर आक्रमण करने के लिए सेना संगठित कर रहे थे। ये बात राजा को मालूम हुई कि उसकी परेशानियां और बहुत बढ़ गई हैं। एक दिन राजा ने अपने महल में कुछ लोगों को षड़यंत्र करते हुए पकड़ लिया। इन बातों की वजह से राजा के जीवन से सुख-शांति गायब हो गई थी।

राजा का एक सेवक दिनभर शाही बाग की देखभाल करता और सुबह-शाम पेटभर सूखी रोटियां खाता था। लेकिन, उसके चेहरे पर शांति और प्रसन्नता दिखाई देती थी। राजा को सुखी सेवक से जलन होती थी। राजा सोचता था कि मेरा जीवन से अच्छा तो इस सेवक का जीवन है। कोई चिंता नहीं है, अपना काम किया और सुबह-शाम पेटभर खाना खाकर आराम करता है। मेरी तो भूख भी मर गई है और नींद भी नहीं आती।

एक दिन राजा के महल में प्रसिद्ध संत पहुंचे। राजा ने संत का मनोभाव किया। संत सेवा से बहुत प्रसन्न हुए। राजा ने संत को अपनी सभी परेशानियों को बता दिया। संत ने उस राजा से कहा कि आपकी सभी स्थितियों की जड़ ये राजपाठ है। आप एक काम करते हैं।

इस बात के लिए राजा मान गए। उसने संत को राजा घोषित कर दिया। संत ने उससे कहा कि तुम अब क्या करोगे?

राजा बोला कि अब तो मेरे पास धन नहीं है। मैं कहीं नौकरी करूँगा संत ने कहा कि तुम मेरे यहाँ ही नौकरी करते हो। मेरे राज्य का संचालन करो, इसका तुम्हें अनुभव भी है। मैं तो अपनी कुटिया में ही रहूँगा, तुम महल में रहकर राज्य की व्यवस्था संभाल लो।

राजा इस काम के लिए तैयार हो गए। अब राजा चिंता मुक्त था। एक नौकर बनकर उसे सुख-शांति मिल गई थी। अब वह कौशल से राज्य का संचालन करने लगा। पेटभर खाता और नींद भी अच्छी आने लगी। क्योंकि, राजा को इस बात की चिंता नहीं थी कि राज्य पर संकट आ गया तो क्या होगा, क्योंकि राज्य तो संत का था।

कुछ दिनों के बाद संत महल में आए तो राजा ने कहा कि महाराज मैं अब बहुत खुश हूं। संत ने उसे कहा कि राजन् तुम पहले भी यही सब काम कर रहे थे, लेकिन उस समय तुमने काम को बहुत मान लिया था। अब तुम अपने काम को कर्म मानकर कर रहे हो, प्रसन्न होकर काम करने से मन शांत रहने लगा है। इसी कारण से आपकी चिंताओं से दूर हो गए हैं।

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