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किसान आंदोलन से अलग हुए वीएम सिंह मेनका गांधी के ममेरे भाई थे, उनके खिलाफ ही चुनाव था


नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस (गणतंत्र दिवस) पर निकाली गई किसान ट्रैक्टर रैली (किसान ट्रैक्टर रैली) के दौरान मचे बवाल और हिंसा के बाद रास किसान मजदूर संगठन के नेता वीएम सिंह ने खुद को किसान आंदोलन से अलग कर लिया है। वीएम सिंह ने भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि मैं ऐसे आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकता जिसकी दिशा अलग हो। सिंह ने कहा कि हम यहां सीपीपी के लिए आए थे गुंडागर्दी के लिए नहीं। वीएम सिंह ने ट्रेलर परेड के दौरान उपद्रव करने वालों के खिलाफ एक्शन की भी मांग की। वीएम सिंह उत्तर प्रदेश के करोड़पति किसानों की फेहरिस्त में शुमार हैं।

वीएम सिंह कौन हैं
वीएम सिंह भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी के मामा के बेटे लगते हैं। हालांकि वह 2004 में अपनी बहन मेनका और 2009 भांजे वरुण गांधी के खिलाफ चुनाव में खड़े हो चुके हैं। हालांकि दोनों ही बार सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। पीलीभीत से विधायक रह चुके सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमीर राजनेता और किसान नेताओं में गिने जाते हैं। राष्ट्रीय किसान मज़दूर संगठन के संयोजक सिंह ने गन्ना मूल्य के भुगतान के लिए सफल कानूनी लड़ाई भी लड़ी थी।

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चुनाव जीतने में की मेनका गांधी की मदद थी

वीएम सिंह ने 2016 में एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके और मेनका के बीच घनिष्ठ संबंध थे। उन्होंने यह भी दावा किया था कि जब 1989 में मेनका गांधी जनता दल के उम्मीदवार के तौर पर पीलीभीत से लोकसभा चुनाव लड़ी थी तब उन्होंने मेनका की चुनाव जीत में मदद की थी। चुनाव जीतने के बाद मेनका केंद्रीय पर्यावरण और वन राज्य मंत्री बनीं और फिर वीएम सिंह उनके विशेष सचिव बने। सिंह ने 1993 में जनता दल के टिकट पर पीलीभीत से चुनाव लड़ा था जिसमें उन्हें जीत मिली।

1996 में सिंह और मेक्का के रास्ते अलग हो गए। इन दोनों के ही परिवारों ने लगभग तीन दशकों तक संपत्ति के लिए लड़ाई लड़ी जो 2005 में खत्म हुई। सिंह ने बताया कि जब यह लड़ाई चल रही थी तब भी उनके बीच सौहार्दपूर्ण संबंध थे।

20 साल से लगातार हार रहे चुनाव
सिंह को पिछले 20 साल से चुनावों में लगातार हार का सामना करना पड़ा है। 2002 में सिंह ने पूरनपुर से निर्दलीय चुनाव लड़ा। 2004 में कांग्रेस के टिकट पर मेनका गांधी के खिलाफ संसदीय चुनाव लड़ा गया। 2007 में एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर पूरनपुर से चुनाव लड़ा। 2009 में सिंह मेनका गांधी के बेटे वरुण गांधी के खिलाफ कांग्रेस के टिकट में मैदान में उतरे। 2012 के विधानसभा चुनाव में वह उत्तर प्रदेश के बरखेड़ा से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े। इन सभी चुनावों में सिंह को हार का मुंह देखना पड़ा।

एक इंटव्यू में सिंह ने बताया था कि बंटवारे के समय उनके दादा और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने भारत और पाकिस्तान में अपनी जमीनों की अदला-बदली कर ली थी। जिसके कारण उन्हें मुजफ्फरनगर में 1200 एकड़ जमीन और उत्तर पश्चिमी दिल्ली के पंजाब खोर में 300 एकड़ जमीन मिली। पंजाब खोर में अभी भी सिंह के पास 200 एकड़ जमीन है।

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सिंह दावा करते हैं कि 1967-68 में शुरू हुई हरित क्रांति उनके दिल्ली वाले खेत से ही शुरू हुई थी। सिंह यह भी दावा करते हैं कि उनके दादा और मेनका गांधी के नाना सर दतार सिंह ने साहीवाल गाय की ब्रीड की खोज की थी।

2009 में 632 करोड़ रुपये आंकी गई थी
2009 के चुनावों में सिंह ने 632 करोड़ रुपये की संपत्ति की घोषणा की थी। उनके चुनावी एफिडेविट के अनुसार उनके पास 400 करोड़ रुपये की कीमत की खेती योग्य भूमि और 200 करोड़ रुपये की कीमत वाली गैर-कृषि योग्य भूमि है। उनके घर सहित सम्पत्ति की कीमत 632 करोड़ रुपये आंकी गई थी।

सिंह ने 2017 विधानसभा चुनावों से पहले 2015 में राष्ट्रीय किसान मजदूर पार्टी की शुरुआत की थी। उनके 21 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे और सभी की जमानत बच गई थी। 2019 के आम चुनावों में वह कांग्रेस से टिकट मिलने की उम्मीद कर रहे थे, हालांकि उन्हें टिकट नहीं दिया गया था।

वीएम सिंह कई बार मेनका गांधी के पशुओं के प्रति प्रेम को लेकर सवाल उठा चुके हैं।





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