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कोविद -19 डेथ: भारत और ब्रिटेन की तुलना से पता चलता है कि कैसे बोरिस जॉनसन फेल हुए


नई दिल्ली। ब्रिटेन ने इस सप्ताह को विभाजित से हुई मौतों का एक लाख का आंकड़ा पार कर लिया। शुक्रवार तक यह आंकड़ा 1,03,126 पहुंच गया था। इस आंकड़े की तुलना अगर आबादी के अनुपात के मुताबिक भारत से करें तो अब तक भारत में 22 लाख लोगों की मौत होनी चाहिए। लेकिन अब तक यहां मौतों का आंकड़ा 1,54,000 ही पहुंच गया है। शुक्रवार तक ब्रिटेन (ब्रिटेन) में 37.5 लाख को विभाजित पॉजिटिव रोगी थे। भारत में इस गणना से यह आंकड़ा 8 करोड़ होना चाहिए। सधे शब्दों में कहें तो यह पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर की आबादी के बराबर यह आंकड़ा होना चाहिए। तो आखिरकार ब्रिटेन में क्या गड़बड़ी हुई?

भ्रांति की शुद्धता को न समझना
पिछले साल जनवरी के आखिर में कोविड (Covid-19) के दो मरीज ब्रिटेन में मिले थे। लेकिन उसके कई हफ्तों बाद तक ब्रिटेन गर्वनमेंट ने कुछ ठोस कदम नहीं उठाए बल्कि स्वास्थ्य सचिव मट हैंकॉक ने बयान दिया कि कोरोनावायरस से निपटने के लिए उनकी तैयारी पूरी है। उन्होंने कहा, यूके ने विश्व की सबसे बेहतरीन टेस्ट किट विकसित की है। सरकार ने खतरे की शुद्धता को समझने की जगह इसे हल्के ढंग से लिया।

से जागी सरकारपिछले साल 2 मार्च को 40 मामले एक दिन में सामने आए। दो सप्ताह में यह संख्या 616 हो गई। संख्या तेजी से बढ़ गई लेकिन टेस्ट शुरू नहीं हुआ। 10 मार्च को लॉकडाउन (तालाबंदी) की मांग उठी। प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा, ‘पढ़ने की जरूरत पर लकाडउन की घोषणा होगी।’ कोरोना केसेज बढ़ते गए। ब्रिटेन के शेफ साइंटिफिक ऑफिसर वेलेंस ने कहा, ‘लॉकडाउन के लिए हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इसका परिणाम जे थकाऊ होगा।’ ब्रिटेन की गर्वनमेंट ने 23 मार्च को तब लॉकडाउन की घोषणा की जब लोगों की मौतों केआंकडे के सामने आने लगे। जब मौतों की संख्या बहुत अधिक हो गई तो गो बोरिस जॉनसन (बोरिस जॉनसन) ने टेस्ट की घोषणा की। लेकिन टेस्ट के नतीजे उतने अच्छे नहीं आए जिसका दम यहां की सरकार भर रही थी।

गर्मियों में ‘गेट-लूटगेडर’ ने फिर से मामला बढ़ा दिया

गर्मियों में घटते मामलों की संख्या से उत्साहित ब्रिटेन सरकार ने लॉकडाउन में ढील दे दी। सरकारी लोगों को घर से बाहर निकलने और मेलजोल बढ़ाने के लिए प्रेरित करने शुरू कर दिया। एक स्कीम चलाई गया, जिसका नाम था-ईट आउट टू हेल्प आउट। इस स्कीम के तहत हर रेस्त्रां को मदद करने के लिए सरकार ने बड़ा पैकेज जारी किया ताकि वे लोगों को आधी कीमत में खाना खिला सकें। फिर क्या था, लोगों का हुजूम बाहर निकलना शुरू हो गया। लेकिन सरकार का यह दांव उलटा पड़ा और मामलों का ग्राफ एक बार फिर तेजी से बढ़ने लगा।

अक्टूबर में सरकार ने बहुत सीमित रोक के साथ लॉकडाउन जारी रखा, जबकि ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने पूरी लॉकडाउन की मांग की। दिसंबर में अशिक्षित मामला सामने आया। और इस बार चिंताजनक यह था कि वायरस अब एक नए तनाव के साथ लोगों को संवेदनशील कर रहा था। मध्य दिसंबर में लंदन के स्वास्थ्य सचिव और मेयर साकिब खान ने साफ कहा कि वायरस का संक्रमण अब आउट ऑफ कंट्रोल हो चुका है।

लेकिन सरकार ने तब तक पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा नहीं की, लेकिन स्थानीय स्तर पर सीमित पाबंदी के साथ लॉकडाउन किया गया। स्वास्थ्य संस्थानों की सख्त चेतावनी के बाद भी क्रिसमस डे पर लोगों को उत्सव मनाने की छूट दी गई। थर्ड लॉकडाउन मध्य फरवरी तक। मार्च आते-आते ही सरकार पूरी तरह सजग हो गई।

देर से आए दुरुस्त आए
वैक्सीन आर्डर के मामले में ब्रिटेन ने सजगता बरती है। अलग-अलग संस्थानों से ब्रिटेन की सरकार ने 6.5 करोड़ की आबादी के लिए 40 करोड़ वैक्सीन आर्डर की। यहां पर्याप्त स्टॉक आ चुका है। वितरण और वैक्सीनेशन की प्रक्रिया भी काफी तेज है। लेकिन यह सरकार अगर समय पर जाग जाती तो शायद दसियों हजार मौतों को होने से रोका जा सकता था।

(संजय सूरी की ये कहानी मूलरूप में अंग्रेजी में है। यह यहाँ क्लिक करें कर पूरा सिखाया जा सकता है।)





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