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गोल्डन गर्ल की मजबूरी: झारखंड की राष्ट्रीय स्तर तीरंदाज ममता टुडू ने आर्थिक तंगी के चलते छोड़ी अपनी प्रैक्टिस, पकौड़े और झालमुड़ी बेचकर उठाई परिवार की जिम्मेदारी


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  • ममता टुडू, झारखंड की राष्ट्रीय स्तर की आर्चर, अपने अभ्यास, पकोड़े और झालमुड़ी को वित्तीय बाधाओं के कारण बेचकर परिवार की ज़िम्मेदारी छोड़ दी।

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4 मिनट पहले

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लॉकडाउन का असर हमारे देश पर इस हद तक हुआ है जिसके कारण लाखों लोग बेरोजगार हुए हैं तो कई लोगों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो गया है। सिर्फ अप्रवासी श्रमिक और लघु उद्योग करने वाले लोग ही नहीं बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों के टैलेंटेड लोग भी इस महामारी के चलते आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। ऐसे ही लोगों में 23 साल की तीरंदाज ममता टुडू भी शामिल है। झारखंड की रहने वाली ममता एक राष्ट्रीय स्तर की तीरंदाज है जिसने विजयवाड़ा में हुई 13 तीरंदाजी में राष्ट्रीय चैंपियन का अवार्ड जीता था। तब से लोग उसे गोल्डन गर्ल के नाम से जानने लगे।

2010 और 2014 में ममता ने जूनियर और सब जूनियर कैटगरी में गोल्ड मेडल जीता था। महामारी के कारण ममता के लिए अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना मुश्किल है। अब ममता पकौड़े बेचकर अपनी आजीविका चला रही है। ममता को बचपन से ही तीरंदाजी का शौक था। उन्होंने 13 साल की उम्र में अपने पिता द्वारा दिए गए बांस के तीर और धनुष से तीरंदाजी सीखने की शुरुआत की। वह धनबाद मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर स्थित हैंडलटोला में अपने माता-पिता और छोटे भाईयों के साथ रहता है।

महामारी से पहले वह रांची एक्सीलेंसी में अपनी प्रैक्टिस कर रही थी। लेकिन कोरोना काल में वह बंद हो गया और ममता अपने घर लौट आईं। यहाँ आने के बाद जब परिवार की खराब आर्थिक स्थिति उन्हें नहीं देखी गई तो उसने एक झोपड़ीनुमा दुकान में पकौड़े और झालमुड़ी बेचने की शुरुआत की।

ममता के पिता एक दिहाड़ी मजदूर हैं। वे कहती हैं कि मेरे पिता का काम कभी चलता है तो कभी बंद हो जाता है। ऐसे में घर का खर्च चलना मुश्किल है। इसलिए उन्होंने पकौड़े बेचने का काम शुरू किया। हालांकि ममता अब भी अपने देश के लिए तीरंदाजी में नाम कमाना चाहती हैं। वे चाहते हैं कि सरकार उनकी मदद करें। अगर उन्हें नौकरी मिल जाए तो इस काम के साथ ही वे तीरंदाजी की प्रैक्टिस भी जारी रखना चाहते हैं।

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