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जन्म से नहीं हैं हाथ, पैर का इस्तेमाल कर लिखा पेपर, CBSE 10वीं की परीक्षा में मिले 72%


बिक्रम भट्टराई की तस्वीर

बिक्रम ने कहा, ‘मेरा परिवार मेरी मजबूती है. सभी ने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया और हमेशा मेरे साथ खड़े रहे. एक दिन मैं अपने परिजनों को गर्व का अहसास कराऊंगा.’

प्रतिभा किसी संसाधन का मोहताज नहीं होती. इस बात को सच कर दिखाया है सिक्किम स्थित समा गवर्नमेंट सेकेंडरी स्कूल (पूर्व सिक्किम) के बिक्रम भट्टराई ने. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की ओर से आयोजित 10वीं की परीक्षा में बिक्रम ने अपने सारे पेपर पैर से लिखे थे. उन्हें 72फीसदी अंक मिले हैं.

16 वर्षीय बिक्रम का जन्म बिना हाथ के हुआ. बिक्रम ने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं माना. उन्होंने अपने पैरों को हाथ मानकर तमाम आश्चर्यजनक काम किए जो दूसरों के लिए कठिन होते हैं.

 हाथ न होने को कभी कमजोरी नहीं माना 

समा लिंगदम गांव के निवासी जनुका और नरपति भट्टराई के बेटे बिक्रम ने हाथ न होने को कभी अपनी कमजोरी नहीं माना. 10वीं में साइंस से परीक्षा देने वाले बिक्रम ने कहा, ‘मैं अपने अंकों से खुश हूं. मैं इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनना चाहता हूं.’ बिक्रम के अंकों से खुश पिता नरपति ने कहा कि तमाम बाधाओं के बावजूद उनके बेटे का सपना पूरा हो, इसकी वह पूरी कोशिश करेंगे.यह भी पढ़ें:  100% Marks अच्छे हैं, लेकिन ये ट्रेंड नहीं… नंबरों का प्रेशर बाद में खड़ी कर सकता है मुश्किल

बिक्रम भट्टराई की तस्वीर

परिवार के लिए बताते थे दुर्भाग्यशाली

CBSE की परीक्षा में अच्छे लाने पर वो लोग भी बिक्रम की प्रशंसा कर रहे हैं जो उसके जन्म पर उसे परिवार के लिए दुर्भाग्यशाली बताते थे. नरपति ने कहा कि, वह हमेशा से अच्छा बच्चा रहा है. उसने कभी अपना आत्मविश्वास नहीं खोया. गांव में लोग हम पर ताने मारते थे कि बिना हाथ का यह बच्चा हमारे लिए दुर्भाग्य लगाएगा.

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मिला था नेशनल चाइल्ड अचीवमेंट अवार्ड 

साल 2010 में महिला और बाल कल्याण मंत्रालय द्वारा असाधारण भावना और साहस के लिए बिक्रम को नेशनल चाइल्ड अचीवमेंट अवार्ड से भी नवाजा गया था. खाने, नहाने से लेकर, मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल करने, ब्रश करने, पेंट करने तक, यह सब बिक्रम पैरों से करते हैं. उनके परिवार ने उनका पूरा साथ दिया और हर समय उनके साथ खड़े रहे..

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बिक्रम ने कहा, ‘मेरा परिवार मेरी मजबूती है. सभी ने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया और हमेशा मेरे साथ खड़े रहे. एक दिन मैं अपने परिजनों को गर्व का अहसास कराऊंगा.’

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