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फास्ट ग्रोथ: आधे समय में यूनिकॉर्न बन रहे हैं आजकल की स्टार्टअप, ज्यादातर एक्टिवर को फंडिंग में मिल रहे पुराने स्टार्टअप के अनुभव का फायदा है।


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9 मिनट पहले

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  • विजेताओं यूनिकॉर्न- मेकमायट्रिप, नौकरी.कॉम और जस्टडाल को बिलियन डॉलर वेल्यूएशन पाने में लगे हुए थे 15 साल
  • रेजरपे, स्विगी, रिविगो और अनएकेडमी ने पांच साल के लिए; उड़ान, ओला इलेक्ट्रिक और ग्लेन्स को लगे सिर्फ 2.4 साल

2021 को आए महज दो महीने हुए हैं और देश की तीन कंपनियां यूनिकॉर्न बन गई हैं। बिलियन डॉलर वेल्यूएशान वाली स्टॉप की लिस्ट में कंपनियां पहले से ज्यादा तेजी से जगह बनाने वाली हैं। इस लिस्ट में पिछले महीने मुंबई की कंस्ट्रक्शन प्रोक्योरमेंट मार्केट प्लेस इंफ्रा। रिटेल और हेल्थकेयर टेक स्टार्टअप इनोवैक्स की एंट्री हो गई है। डिजिट इंश्योरेंस का वेल्यूएशन भी इस जनवरी में एक अरब डॉलर से ज्यादा हो गया था।

2018 से अब तक यूनिकॉर्न की संख्या 10 से बढ़कर 28 तक पहुंच गई है

2018 तक देश में 10 यूनिकॉर्न थे और वेंचर इंटेलीजेंस के डेटा के मुताबिक, इनकी लिस्ट में अब तक 28 का इजाफा हो चुका है। यह तब हुआ जब देश में व्यापक आर्थिक स्थितियां अनुकूल नहीं रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, एक भारतीय स्टार्टअप को यूनिकॉर्न बनने में लगभग आठ साल लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह पीरियड रहा है। ओरियोस वेंचर पार्टनर्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, नए स्टार्टअप पुराने यूनिकॉर्न के मुकाबले ज्यादा तेजी से बिलियन डॉलर वेल्यूएशन हासिल कर रहे हैं।

उड़ान, ओला इलेक्ट्रिक और ग्लांस को यूनिकॉर्न बनने में लगे हैं २.४ साल

देश की सबसे पुरानी स्टार्टअप मेकमायट्रिप, नौकरी.कॉम और जस्टडाल 2005 से पहले शुरू हुई थीं। इनको बिलियन डॉलर वेल्यूएशन हासिल करने में लगभग 15 साल लगे थे। उनके मुकाबले रेजरपे, स्विगी, रिविगो और अनएकेडेमी जैसे स्टार्टअप औसतन पांच साल में ही यूनिकॉमी बन गए। उड़ान, ओला इलेक्ट्रिक और ग्लेन्स को बिलियन डॉलर वेल्यूएशन हासिल करने में 2.4 साल लगे हैं।

ओरियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने के मुकाबले न्यू स्टार्टअप को बिलियन डॉलर वेल्यूएशन ज्यादा जल्दी हासिल होने की एक वजह यह हो सकती है कि इनमें से ज्यादातर के एक्टिवर को स्टार्टअप चलाने का पुराना अनुभव है और ये ज्यादा आसानी से फंड इकट्ठा कर सकते हैं।

कम-से-कम 12 स्टार्टअप 2021 में बन सकते हैं यूनिकॉर्न

आईटी इंडस्ट्री बॉडी नैसकॉम के मुताबिक यूनिकॉर्न वाली लिस्ट में जल्द ही कई नाम जुड़ सकते हैं। नैसकॉम ने इसी वर्ष जारी रिपोर्ट में कहा था कि कम से कम 12 का वेल्यूएशन 2021 में एक अरब डॉलर पार किया जा सकता है। टेक यूनिकॉर्न की संख्या में वृद्धि की वजह भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में ऑपरेटरों का भरोसा है।

केपीएमजी इंडिया के मुताबिक, पिछले पांच साल में प्राथमिक इक्विटी और वेंचर कैपिटल का इनवेस्टमेंट डबलना हो गया है। इन न सिर्फ प्राथमिकताओं इनवेस्टमेंट ज्यादा हो रहा है बल्कि इसमें पैसा भी लंबे समय के लिए लग रहा है। इससे पता चलता है कि भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम मैच्योर हो गया है।

मैको इकोनोमिक बाधाओं के बावजूद PE / VC इनवेस्टमेंट में लगातार वृद्धि हुई

केपीएमजी इंडिया ने 300 डील की स्टडी में पाया कि प्राथमिक इक्विटी फंड को कैपिटल मार्केट के कई सेक्टरों से ज्यादा सालाना रिटर्न मिला है। इसका कहना है, ‘मैको इकोनोमिक बाधाओं के बावजूद प्राथमिक शुद्धता और वेंचर कैपिटल इनवेस्टमेंट में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ये फंड हर ग्रोथ साइकिल की कंपनियों में निवेश के मौके तलाश रहे हैं। ‘

फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज सेक्टर की ज्यादातर भारतीय यूनिकॉर्न हैं

भारत में ज्यादातर यूनिकॉर्न फाइनेंशियल टेक्नोलॉजीज सेक्टर की हैं। इसके बाद रिटेल और सास स्टार्टअप का नंबर आता है। इससे पता चलता है कि पेमेंट कंपनियों की बाढ़ आने से पहले देश में बैंकिंग फैसिलिटी की बहुत कमी थी।

ओरियोस वेंचर पार्टनर्स के रेहान यार खान के मुताबिक, ‘बात लोन या वेल्थ मैनेजमेंट या पेमेंट की हो, बैंकिंग सिस्टम की जड़ें ज्यादा गहराई में नहीं जमी थीं। फिनटेक यूनिकॉर्न ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद कमियों को दूर करने की कोशिश की। ‘

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