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बोधकथा: जो पास है, उसे एक क्षण भी अतिरिक्त नहीं पा सकोगे, तो दर्प कैसे और किस वस्तु का?


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ओशो23 मिनट पहले

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  • जो हासिल है, उसका शुक्र मनाओ। घमंड करने का कोई लाभ नहीं। समय ख़त्म हुआ, तो ख़त्म ही समझो।

सिकंदर जब भारत आया, तो एक फक़ीर से मिलने गया। सिकंदर अपनी अकड़ में था, जीतता चला आ रहा था। हार वह नहीं होना चाहिए था। उसके जैसा विजेता कोई नहीं, तभी तो महान कहा जाता था। लेकिन उस फक़ीर ने उसको ऐसे देखा जैसे कोई दरोगा चोर को देखता हो। सिकंदर थोड़ा तिलमिलाया। उसने कहा, ‘ऐसे क्या दिखता है? मैं सिकंदर महान हूं। ‘

फकीर ने कहा, ‘कौन सी बात से महान है?’

सिकंदर ने कहा, ‘सारी दुनिया जीत चुकी है।’

फकीर ने कहा, ‘एक बात सुन। तू मरुस्थल में खो जाए, रास्ता भटक जाए, प्यास लगे तुझे और मैं अपना यह लोटा भर पानी भरकर तेरे सामने आ जाऊं। गो गिड़गिड़ाए कि मुझे पानी दे दो और मैं कहूं कि पानी क्या देगा? तो आप बोलिए, ज्यादा से ज्यादा कितना संभव है? ‘

सिकंदर ने कहा, ‘अगर ऐसी हालत है कि मरुस्थल में मर रहा हूं, पानी के लिए तड़प रहा होऊं, तो अपना आधा राज्य दे दूंगा।’

लेकिन फक़ीर ने इंकार में सिर हिलाते हुए कहा, ‘आधे में मैं नहीं कहता। तूने समझा ही क्या है मैं बेच दूंगा इतना सस्ता में? ऐसा मौका छोड़ोगे? कुछ आगे बढ़ा। लेना ही हो, तो साहस कर, कंजूसी क्या कर रही है? ‘

सिकंदर ने कहा, ‘अगर ऐसी ही स्थिति आ जाए, तो अपना पूरा राज्य दे सकता है।’

तब फक़ीर ने कहा, ‘तो बस हो गए मतलब हल। मेरे लोटे भर पानी की कीमत है तुम्हारा राज्य की। तो मेरा लोटा तेरा राज्य से कुछ छोटा नहीं है। तो तू क्यों अकड़ा हुआ है? एक लोटे पानी में बिक जाएगा तेरा सारा जीता हुआ राज्य। और मैं तुज़से कहता हूं, जब मृत्यु द्वार पर दस्तक होगी, तो पूरा राज्य भी देगा, तब भी एक क्षण नहीं पा सकेगा। ‘

और ऐसा ही हुआ। सिकंदर जब भारत से वापस जा रहा था, तो रास्ते में मर गया था। मरते समय अपने घर से महज़ चौबीस घंटे दूर था। अपनी मां से वादा करके आया था कि कुछ भी हो जाए, लौटकर आऊंगा और सारी दुनिया तुम्हारी चरणों में चढ़ा दूंगा। उस समय उन्होंने अपने वैद्यों से कहा, ‘कुछ भी करो चौबीस घंटे के लिए बचा लो।’ उन्होंने असमर्थता जताई, तो सिकंदर हंसने लगा। उसे फक़ीर की बात याद आई। कहने लगा, ‘ठीक ही कहा था फक़ीर ने। आज पूरा राज्य भी दे रहा है। तो क्या हुआ? यह जीवित जल में चला गया। पानी पर रेखाएँ खींची जा रही हैं। ‘

(ओशो के प्रवचनों से साभार)

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