Home देश की ख़बरें भास्कर ओरिजिनल: 1951 के बाद सबसे खराब दौर में रेलवे; डगमगा...

भास्कर ओरिजिनल: 1951 के बाद सबसे खराब दौर में रेलवे; डगमगा रहा फ्यूचर प्रोजेक्ट, फ्रीज हो गया 50%


  • हिंदी समाचार
  • डीबी मूल
  • भारतीय रेलवे राजस्व; कोरोनावायरस लॉकडाउन से पहले पैसेंजर ट्रेन | ऐतिहासिक घटनाएं 1853 से 2020 तक

विज्ञापन से परेशान है? बिना विज्ञापन खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

3 घंटे पहलेलेखक: जनार्दन पांडेय

  • कॉपी लिस्ट

1910 के दशक में भारतीय रेलवे पर प्रकाशित ‘कूच परवा न पुर रेलवे’ के नाम की स्केच बुक बहुत प्रसिद्ध हुई। कारण, जबर्दस्त व्यंग से भरे स्केच; जैसे- ‘रेलवे कर्मी काम पर हैं’ कैप्शन वाले स्केच में शेफ इंजीनियर ऑफिस में नाच का लुत्फ ले रहे हैं, एक कर्मचारी मैनेजर को पंखा हांक रहा है और ट्रेन की पटरी पर हाथीॉय है। ये सब इशारे थे कि रेल सेवा की बागडोर ऐसे हाथों में है, जिसने इसे मतवाला हाथी बना दिया है।

1910 में नए तरीके से प्रकाशित स्केच बुक का 22 वां पन्ना- रेलवे कर्मी काम पर हैं।

1910 में नए तरीके से प्रकाशित स्केच बुक का 22 वां पन्ना- रेलवे कर्मी काम पर हैं।

ग्रेट इंडियन पेनिन्यूरर रेलवे की पत्रिका में छपने के बाद ये स्केच बुक बहुत प्रसिद्ध हुई थी।

ग्रेट इंडियन पेनिन्यूरर रेलवे की पत्रिका में छपने के बाद ये स्केच बुक बहुत प्रसिद्ध हुई थी।

स्केच बुक आर्टिस्ट ने बनाई थी, लेकिन हर स्केच पर उसका सिग्नेचर था- जो हुक्म।

स्केच बुक आर्टिस्ट ने बनाई थी, लेकिन हर स्केच पर उसका सिग्नेचर था- जो हुक्म।

110 साल बाद भी ये स्केच बुक प्रासंगिक है। अंग्रेजी लहजे में बोले गए तीन शब्द ‘कूच, परवा, नय यानी कुछ परवाह नहीं’ नाम की ये व्यंग से भरी स्केच बुक आज के रेलवे संचालन के तौर-तरीकों से बिल्कुल मेल खाती है। आइए कुछ नए स्केच खींचते हैं; व्यंग के लिए नहीं, मौलिकता में भारतीय रेल को जानने के लिए।

2 साल पहले ही 1951 के बाद सबसे खराब परिचालन रेशियो पर पहुंच गया था रेलवे

रेलवे की हालत जानने का आसान तरीका है, ऑपरेटिंग रेशियो। यानी ,100 रुपये कमाने के लिए रेलवे को ईंधन पर, इंजन पर, स्टेशन पर और ोंडिब्बों की मरम्मत पर, ट्रैक रिन्यू करने पर, कर्मचारियों के वेतन आदि सभी सेवाओं पर कुल कितने रुपये खर्च करने के होते हैं। इससे आप 70 साल पहले से लेकर आज तक की रेल सेवा की हालत अंदाजा लेंगे। जिन सालों में खर्च कम रहा, उस साल में सबसे ज्यादा कमाई हुई।

2017-18 के ऑपरेटिंग रेशियो 98.44 को 1951 के बाद सबसे खराब बताया गया। वर्ष 2018-19 में रेलवे ने ऑपेरटिंग सिल्कियो 96.20 दिखाया, लेकिन कैग की ऑडिट रिपोर्ट में इस पर सवाल उठाए गए। दावा था कि रेलवे ने 100 रुपए की कमाई के लिए 101.77 रुपए खर्च किए, जो रेलवे के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा नुकसान था। वर्ष 2019-20 में परिचालन रेशियो 98.41 रहा। वरिष्ठ पत्रकार श्रीनद झा कहते हैं कि बीते 10 साल में टिकट के मूल्य में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई है। रजनेता डरते हैं। राजनीतिक फायदे के चक्कर में रेलवे के नुकसान की अनदेखी होती है।

भारतीय रेलवे, कोरोना के पहले और कोरोना के बाद

पहले ही सौदों की मार झेल रही भारतीय रेलवे के लिए कोरोना ने नई रणनीति बनाने का मौका दिया। उत्तर रेलवे के एक अधिकारी का कहना है कि कोरोना के बाद राजधानी, भोपाल एक्सप्रेस, लखनऊ मेल, प्रयागराज एक्सप्रेस, जयपुर जोधपुर एक्सप्रेस और साबरमती जैसी ट्रेन चलाई गई, जिसमें सबसे ज्यादा कमाई है। एसी कोच में तकिया-कंबल सेवा बंद कर दी गई, लेकिन कोविड स्पेशल ट्रेन का किराया कम नहीं हुआ।

हालांकि, लॉकडाउन के बाद अब तक 10% ट्रेन भी शुरू नहीं की जा सकी हैं। इसके बावजूद काम पर लौटे कर्मचारियों में अब तक 30 हजार से ज्यादा को कोरोना हो चुका है और 700 की मौत हो चुकी है।

ट्रेन बंद होने का आम जीवन पर ऐसा असर, 330 के बजाए खर्च हुए 7000
पंकज बताते हैं कि उनके दोस्त रोज़ाना ट्रेन से 75 किमी की यात्रा करके गोरखपुर नौकरी के लिए जाते थे। इसके लिए वे 330 रुपए का रेल पास बनवाते थे। मार्च में ट्रेन बंद होने पर उन्हें शहर में 7000 रुपये का घर लेना पड़ा। जब ट्रेन खुली तो लगभग 700 में बन रही हैं। इसी तरह बिहार के अररिया जिले की छोटी-सी जगह फारबिसगंज में रहने वाले कृष्ण मिश्रा कहते हैं कि उनके यहां 8 जोड़ी ट्रेन आती थीं। वहाँ से सैकड़ों रिक्शेवालों और लगभग 100 दुकानदारों की रोज़ी चलती थी। अब वहाँ न रिक्शेवाले हैं, न ही कोई दुकानदार।

अभी ऐसी कोई स्टडी सामने नहीं आई है, जिसमें रेलवे के रुकने से आम लोगों को कितना नुकसान हुआ है, इसका आकलन संभव हो गया है। लेकिन, इन दो केस स्टडी से पता चलता है कि ट्रेन रुकने से पंकज के दोस्त को महीने में 330 के बजाए 7000 रुपए खर्च करने वाले और कृष्ण मिश्रा के कस्बनुमा छोटे शहर में ट्रेन रुकने से सैकड़ों की रोजाना कमाने की जरिया बंद हो गई है।

भारतीय रेलवे की 1.40 लाख वैकेंसी में 50% पर रोक

कोरोना के पहले भारतीय रेलवे में 1.40 लाख पदों पर भर्तियां निकाली थीं। लेकिन, कोरोना काल के बाद 50% भर्तियों पर रोक लगा दी गई है। अब नए सिरे से भर्तियों को लेकर समीक्षा होगी, फिर अगली भर्ती की जाएगी।

रेलवे के निजीकरण का काम भी रुका

संयोग से कोरोना उसी वक्त आया, जब सरकार ने भारतीय रेलवे की 2,800 मेल ट्रेन में से 151 ट्रेनों को बेचने के प्लान को हरी झंडी दिखाई थी। रेलवे में 5% निजीकरण के तहत 2023 में 151 हाई-स्पीड ट्रेन चलने का लक्ष्य रखा गया था। दिसंबर में इनकी बोलियां लगनी थी, लेकिन कोरोना के नेतृत्व में ये काम रुका हुआ है। अभी इस पर कोई ताज़ा जानकारी सरकार ने नहीं दी है।

रेलवे बोर्ड चेयरमैन और सीईओ वीके यादव का कहना है कि पांडेमिक के बाद रेलवे ने मालगाड़ियों में 98% लोडिंग की है। किसान रेल, नई किस्म के बन रहे लोकोमोटिव और कर्मचारियों की मेहनत हमें पटरी से नहीं उतरने देंगी। तमाम चुनौतियों के बीच 12 मई को रेलवे ने एक कविता ट्वीट की थी; इस में फिर से पड़ने की उम्मीद जताई गई थी।

ना शिशु में रुकी थी, ना युद्धकाल में थमी हूँ!

सावधानी समय की मांग थी, उसे पूरा करने में जुटी हूँ!

देशवासियों की सेवा में, स्टेशन पर तैयार खड़ी हूँ!

मैं भारत की जीवन रेखा, करने वाली देश की सेवा, फिर से अपनों को अपनों से मिलाने, आज फिर से चल पड़ी हूँ!

भारतीय रेल!





Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments