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भोजपुरी स्प्लिट: जिनगी में माई से बढ़िके माई के इयाद, हर दुख-सुख में आवेला इयाद


दुनिया में अइसन का बाबा कि एक बेरी बिला भाटा हेरा गइला प ऊ फेरु हासिल ना हो सके। एकर बस एकही उत्तर बा-माई। जइसे कवनो जीव खातिर राम से अधिका महातम राम के नॉन के होला, ओइस ही माई से बढ़िके माई के इयाद के महिमा बागो कवि के कहनाम बा-

के अपने बछरू के खातिर
क्रीमरी-अस छपिटाई,
रहि-रहि मन परिधि जाले माई!हमरा-अस अभागा खातिर त माई के इयादिए में दुनिया-जहान के सरबस सुख बा। बाकिर गुर के सवाद-मिठास के बयान-बखान का कबो गूंग करि सकला? ना नू!
फेरु महतारी के नेह-छोह आउर ममता के भला सबद भा बानी में कइसे बान्हल जा सकला! गोसाईं जी कहल वही बानीं-

जाकी भावना जैसी,
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।

भाई सुभाषचंद्र यादव जी के इहो बात सोरहो आओ सांच बुझात बा-

जग में माई अइसन केहू सहाई ना होई,
केहू कतनो दुलारी, बाकिर माई ना होई।

तबे नू, भगवान भा कुदरत का बाद भगवान-कुदरत ऑडिट अगर केहू होला, त ऊ माइए नू होली!

संसार के हर संतान के आपन महतारी दुनिया के सभसे सुन्नर-सुभेख आउर महान नज़र आवेली। हमरो माई हमरा निगा में ओसेनेगेई। बाकिर जब हम होश सम्हारलीं आ जेकरा के तुमन ‘माई’ कहिके बोलावत रहलीं, ऊ हमार माई ना रहली। हालांकि ऊ ममता के मूरत रहली आ माइए ऑड हमरा पर सांच परमे आउर नेह-छोह लुटावत रहली। हमरा के पाले-पोसे आ हर किसिम के हुलास-अपाह, सुख-सुविधा देबे में उन्हुकर अगहर भूमिका रहल। ऊ हमार बोरो माई रहली आ उन्हुकर नों रहे मुन्नेश्वरी देवी। उन्हुकर सासु आपन मए जर-जमीन हमरा बाबूजी का नांवें लिखी देले रहली, काँकिं ऊ हमरा आजी (मइया) के सहोदर बहिन रहली।

बोरो माई मोसमत रहली आ उन्हुकर आपन कवनो औलाद ना रहे। उन्हुकरा जिनिगी के बड़े अकथ कहानी रही। बहुत धूमधाम से बड़का बाबूजी का संगे उन्हुकर हाथ पीयर भइल रहे, बाकिर गवना का पहिल यहीं एगो बेमारी के शिकार होके दम तूरि देले रहलन। बड़की माई पहिले हाली जब अंसवारी में बियाठिक ससुरा अइली, त एगो बेवा के रूप में। खाली बियाह के रसम हो गइला के कारन ऊ आपन पहाड़ नियर जिन्गी बड़का बाबूजी के इयाद में गुजराती दिहली। ओह सरगबासी बड़भागी पति के इयाद में, जेकरा से ना कबो भेंट-मुलाकात भाइल रही आ ना कबो सुरतिआ आंख-भर देखा के मोका मिलल रही। उन्हुकर सउंसे जिनिगी बाटे जोहत पासरि गइल रहे। उन्हुका जिनिगी के अनकहल दास्तान हमरा मरम के अइसन उदबेगले रहे कि हम एगो ‘बाट जोहत’ शीर्षक से कहानी लिखे जातितिर अलचार हो गइल रहलीं

ताजिनि अपना खुद के मए दु: ख-कलश बिसरा के ऊ शिवाला में शिवजी के पूजा-पाठ में लवासन रहत रहली। हमरा में त उन्हुकर जान-परान बसत रहे आ माई जशोदा लेखा नेह-ममता लुटावत ऊ अपना जिनिगी के सरबस, हमरे के सउंपि देले रहली। उन्हुकर नेह-छोह का हम कबो भुला-बिसरा सकेलीं? कबो ना! बाकिर जइसहीं हम अपना गोड़ पर थढ़ होके ‘माई’ खातिर किछु करे के काबिल भलीं, ऊ हमरा माथ प हाथ धइले शिवजी के नॉन जपत हरदम-हरदम जातितिर आंखि मूंदीि लिहली। उनहुका जिनिगी में कबो किछु पावे के चाह ना रहल। हरदम दिल खोलिके नेह-छोह बांटल आ लुटावल उन्हुकर जिनिगी रहे। सांचो के मुन्नेश्वरी रहली ऊ।

हमार माई, जे हमरा के अपना कोठी से जनमवले रहली, खाली नँवें के रागिनी ना रहली, बलुक सैम तरह से रागात्मकता से ओत-प्रोत रहली आ मए परिवार के सेवा-टहल उन्हुका जिनिगी के उद्देश्य से चल रहे हैं। उन्हुका नइहर के पढ़ल-लिखल सम्भ्रांत समाज रहे, जवना में पाँच बहिन, एक भाई के परिवार में सैम केहुए हुए रहे। हमार मामा बरमेश्वर उपाध्याय ओह इलाका में अकेले बैरिया इंटरमीडिएट कालेज, बैरिया में अंगरेजी के जानल-मानल प्रवक्ता रहलन आ चांदपुर-चजपुरा के इलाका में उन्हुक बुद्धिजीवी लोगन में नीमन ढाक रहे हैं।

बाकिर हमरा होश सम्हारे के पहिल उसी हमार माई एह निठुर दुनिया से कहा-नाता तूरिके कूच गऽल रहली आ ओह घरी हमार उमर महज दू बरिस के साथ। एह बीचे हमार बड़ भाई कांचे उमिर में सरगबासी हो चुकल रहले। बांचि गइल रहली हमार बड़ बहिन कृष्णा कुमारी। हमरा जनम के दू बरिस बाद एगो छोट मौवल बहिन के जनम देते हैं, माई दुनिया छोड़ि देले रहली। सउँसे परिवार, टोला-परोस एह सदमा में डूबि गइल रहे।

गाहे-बगाहे माई के गुन-गिहिथान के चरचा घर-परिवार आउर टोल-महल्ला में अक्सर होत रहे। केहू उन्हुका मिलनार सुभाव आ सेवा-टहल के गुन गावे, त केहू सामूहिकता में जीएवाला उन्हुकर हंसमुख शख्सियत आउर अगल-बगल के लरिका-लरिकिन पढ़ावे-लिखावे के हुनर ​​के बड़ाई करे। आजी (मइया) के आंखि का सोझा से त उन्हुकर सूरत बिसरते ना रही। ऊ अकसरन सुबुकत कहसु- ‘सासु का सोझा पतोहि दुनिया छोड़ि दिहली, एह से बढ़िके अनहोनी अउर का कहाई! देवी रहली ऊ, पुन्यमा रहली, एही से सरगे चलि गइली आ ​​हम बुढ़ारियो में नरक भोगत बानी। देहि-धाजा त उन्हुकर अइसन रहे कि निमना-निमना लोग के सुननेरई की माँ दे देसु। हंससु, त गाल में नाशा परि जात रहा। सबसे सुन्नर रहे उन्हुका मन के सुनरई।

दोसरा के दु: ख उन्हुका से इचिकियो बरदास ना होत आ रही जीव-जान से सेवा करे लागत लागतली। कसीदाकारी-पढ़ाई में ऊ उपयोग रहली आ रचना-मांगर में उन्हुकर मन रत रहा। ओइसन पीपल का कबो मरिभवला? ‘ Whim-Whim के लोग, Whim-Whim के निहितकही। बाबुओजी के जिनिगी में बुज़िला माई अमित छाप छोड़ले रहली। तबे नू, चढ़ते जवानी में विधुर भलाई के बावजूद ऊ फेरु बियाह ना कइलन आ हीत-नात के बहुत दबाव के बाद हम हम भाई-बहिन खातिर मयभा महतारी लेके से साफे इनकार कऽ देले रहलन।

माई आ बड़की माई-दूनों हमरा खातिर माइए लोग। दूषण एक से बढ़िके एक। पर दुखकातरता आ संवेदनशीलता साइत ओही लोग से हमरा विरासत में भेंटाइल रहे। आजुओ जब हम व्हिम-व्हिम के मुसीबत के सामना करेलीं आ जब कवनो सभ्य दईंतन के अनेती हमरा के ललकारेला, तहाई भकसावन अन्हरिया में माई के इयाद के अंजोरिया हमरा में जीवतता आ आत्मबल भरत साफ-फरिछ राह देखावत रहे। सचहूं, हमरा खातिर माई से बढ़िके बिया माई के इयाद। (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी जी वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)





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