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वास्तव में भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठता नहीं रही है, हैरत में पड़ जाएगी


केंद्र ने हाईकोर्ट में सर्वश्रेष्ठ शादियों के लिए हिंदू मैरिज एक्ट के तहत अनुमति देने का विरोध किया है। केंद्र ने इस बारे में दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर करके कहा है कि ये भारतीय संस्कृति और लोकाचार से मेल नहीं खाता है।

बता दें कि बीबीबी (लेस्बियन-गे-बायसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर-एलजीबीटी) समुदाय से जुड़े लोगों ने दिलनाली हाइकोर्ट में याचिका दाखिल कर विशेष मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट के तहत सर्वश्रेष्ठ शादी को मान्यता देने की मांग की है। जबकि इस मामले की सुनीई दिलनाली हाईकोर्ट में जस्टिस राजीव सहायता एंडला की बेंच कर रही है।

वास्तव में भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठता की जगह रही है। ये एक बड़ा सवाल है। वैसे ये बात सच है कि इतिहास में तमाम धर्मों और समाज में इसके बारे में विचार नकारात्मक ही रहे हैं। अगर भारतीय समाज के नजरिए की बात करें तो ये पुख्ता तौर पर निगेटिव रहा है। हालांकि इसके पीछे बहुत से तर्क और वैज्ञानिक आधार नहीं दिए गए हैं।

दुनिया की ज्यादातर सूचियों में रही श्रेष्ठताइतिहास की बात करें तो दुनिया की ज्यादातर सिद्धांतों में श्रेष्ठता मौजूद रही है। भारतीय संस्कृति में भी यह कुछ हद तक है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री मार्की मीड के अनुसार आदिम समाजों में श्रेष्ठता प्रचलन में था। रोमन सभ्यता में भी यह बुरा नहीं माना गया, जबकि प्राचीन यूनान में तो यह मान्यता ही मिली हुई थी। मानव सभ्यता के शिष्यों के दौर में श्रेष्ठता न कोई अप्राकृतिक काम था न ही कोई अपराध।

जो अप्राकृतिक दिखता है वह प्राकृतिक है
ऋग्वेद की एक ऋचा के अनुसार ‘विकृति: एव प्रकृति:’, यानी जो अप्राकृतिक दीखता है वह भी प्राकृतिक है। अक्सर श्रेष्ठता की पैरवी करने वाली इस बात को सामने भी रखते हैं। उनके अनुसार ‘विकृति: एव प्रकृति: का मतलब ही है कि प्राचीन भारत श्रेष्ठता के प्रति सहिष्णु रहा है।

श्रेष्ठता और किन्नरों का उल्लेख है
रामायण, महाभारत से लेकर विशाखदत्त के पुरारक्षों, वात्स्यायन के कामसूत्र तक में श्रेष्ठता और किन्नरों का उल्लेख है। हालांकि उन्हें सहज सम्मान की दृष्टि से तो नहीं देखा गया था, लेकिन कहीं उनके अतिशय अपमान का भी उल्लेख नहीं मिलता है।

क्या है बराहमिहिर के ग्रंथ वृहत जातक में
बारहवीं सदी में बराहमिहिर ने अपने ग्रंथ वृहत जातक में कहा था कि श्रेष्ठता पैदाइशी होती है। यह प्रयुक्त को संशोधित नहीं किया जा सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक शोधों से भी यह बात साबित हो गई है कि श्रेष्ठता अचानक पैदा हुई उपयोग या विकृति नहीं है, बल्कि यह पैदाइशी घटनाएं होती है।

वात्सायन ने कामसूत्र में किया है उल्लेख है
गुप्त काल में वात्स्यायन ने जब कामसूत्र की रचना की तो उन्होंने साफ लिखा कि किस तरह से उनके मालिक, सेठ और ताकतवर लोग नौकरों, मालिश करने वाले परिवार के साथ शारीरिक संबंध बनाते थे। इसी तरह काल और उसके बाद भारत में तमाम राजवंशों में इससे जुड़े किस्से खूब प्रचलन में रहे हैं।

जब विष्णु मोहिनी बनकर शिव को रिझाते हैं
भारतीय संस्कृति में ही महादेव शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर वाला भी है। मिथकीय आख्यान कहते हैं कि एक बार विष्णु मोहिनी स्त्री रूप धारण कर शिव को रिझाते हैं। इससे उन्हें पुत्र अयप्पा की प्राप्ति होती है। महाभारत में अर्जुन की मर्द से बृहन्नला बन जाते हैं। भगीरथ की दो रड़ियों के संबंध से उत्पन्न हुए पुत्र की कहानी भी पौराणिक कहानियों में सुनी कही जाती रही है।

राजा इल स्त्री बन गए और पुत्र को जन्म भी दिया
पुराणों में राजा इल के स्त्री रूप में ऋषि बुध के रीज़ने और उनकी एक पुत्र प्राप्ति की कहानी भी है। पुराणों में बुध के विवाह के विषय में इसका रोचक तरीके से वर्णन किया गया है।

कथा के अनुसार राजा इल एक बार शिकार खेलने वन में चले गए। अनजाने में ही वह अम्बिका नामक वन में पहुंच गया। अम्बिका वन भगवान शिव द्वारा शंकर थे। एक बार शिव और पार्वती इस वन में विहार कर रहे थे। उसी समय ऋषियों का एक समूह वन में आ गया। इससे पार्वती प्रर्मा हो गई। शिव जी को ये अच्छा नहीं लगा और उन्होंने शाप दे दिया कि शिव परिवार के अलावा अम्बिका वन में जो भी प्रवेश करेगा वह स्त्री बन जाएगा।

शिव के शाप के स्त्री बने और बुध मोहित हो गए
भगवान शिव के शाप के कारण राज इल स्त्री बन गई। अपने बदले रूप को देखकर इल बहुत दुःखी हुए। वन से बाहर निकलने पर उनकी मुलाकात बुध से ई। ऋषि बुध राज इल के स्त्री रूप पर मोहित हो गए। इल ने अपना नाम ईला रख लिया। बुध से विवाह कर लिया। ईला और बुध से पुरूरर्वा का जन्म हुआ। पुराणों में बताया गया है कि पुरूरवा बड़े होकर राजा बने, इनकी राजधानी गंगा तट स्थित प्रयाग थी।

बेटे ने फिर से पुरुष रूप दिलाया
राजा पुरूरवा को एक दिन माता ईला ने दुःखी होकर अपने स्त्री बनने की कथा बताई। इसके बाद पुरुरवा ने निश्चय किया कि वह अपने माता-पिता के रूप में लाने की कोशिश करेगा। इसके लिए पुरूरवा ने गौतमींज यानी गोदावरी तट पर शिव की उपासना की। पुरुरवा की उपासना से प्रसन्न होकर शिव और पार्वती प्रकट हुए। वरदान मांगने के लिए कहा।

पुरूरवा ने शिव से कहा कि उनके माता ईला पुनः राजा इल बन जाएं। इस पर भगवान शिव ने वरदान दिया कि गौतमी गंगा में स्नान करने से ईला फिर इल बन जाएगी। ईला ने गौतमी गंगा में स्नान किया और राजा इल बन गए।

वैदिक शास्त्रों में हुआ है श्रेष्ठता का जिक्र
अमरा दास विल्हेम की पुस्तक तृतीय प्रकृति – पीपुल ऑफ थर्ड सेक्स कई वर्षों के गहन शोध के बाद लिखी गई। इसमें संस्कृत में उन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया गया है जो प्राचीन और मध्य भारत में लिखे गए हैं। उन्होंने ये साबित किया कि श्रेष्ठता की प्रवृत्ति भारतीय समाज में भी हमेशा से रही है, लेकिन उन्हें बहुत कम स्वीकार किया गया है।

दूसरी सदी में लिखित भारतीय ग्रंथ “कामसूत्र” के “पुरुषायिता” अध्याय में पुस्तक एक ऐसी सभी स्त्रियों का जिक्र करती है, जिसे सुनहरीस ने कहा था। ये महिलाएं अक्सर दूसरी स्त्रियों से शादी कर लेती थीं और बच्चा पलती थीं।

खजुराहों की दीवारों पर भी चित्रण
अगर खजुराहों के मंदिरों की दीवारों पर बनी तमाम मुद्राओं की मूर्तियों को देखें तो इसमें नि: शुल्क पुरुषों और महिलाओं के चित्रण की हत्या हुई। वे उसी भाव में नजर आते हैं। माना जाता है कि ये मंदिर 12 वीं शताब्दी में बनाए गए थे।





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