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शायरी: y मैं बहुत ख़ुश था एपिसोड धूप के सन्तनाटे में ’, पढ़ें शायरों के दिलकश कलाम – News18 हिंदी


शायरी: शेरो-सुख़न (उर्दू शायरी) की दुनिया जज्बीबातों की दुनिया है। इसमें हर जज्जीबात (भावना) को क़लमबंद किया गया है। शायरी में जहाँ मुहब्बीत, दर्द से लबरेज़ जज्बीबातों को जगह मिली है, वहीं इंसानी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं को भी ख़ूबसूरत के साथ उकेरा गया है। अगर मुहब्बीत का जिक्र है, तो इस्क़ में मिलने वाले दर्द को भी दिलकश अंदाज़ में पेश किया गया है। एक तरह से कहें तो शायरी दिल से निकली आह है, चाह रही है और सद् है, जिसे हर शायर (कवि) ने अपने जुदा अंदाज़ में पेश किया है। आज हम शायरों के ऐसे ही निश्चित’तीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए भारत में हुए हैं। आज की इस कड़ी में पेश हैं ‘धूप’ पर शायरों का नज़रिया और उनकी कलाम के चंद रंग। आप भी इसके लुद्रफ़ उठाइए।

धूप ने गुज़ारिश की
एक बूंद बारिश बारिश
मुहम्मद अल्वी

फिर याद करें बहुत आयागी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम
जब धूप में साया कोई सर पर न मिलेगा
बशीर बड़

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वह तेरा कोठे पे नंगे पांव आते याद है
हसरत मोहानी

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जाता है धूप उगले परों को समेट के
ज़ख़्मों को अब गिनेंगे मैं बिस्तर पे लेट के
शकेब जलाली

वे सर्दियों की धूप की तरह ग़ुरब हो गए
लिपट रही है जिस्म से लिहाफ़ की तरह
मुसव्विर सब्ज़वारी

मैं बहुत ख़ुश था एपिसोड धूप के सन्नाटे में
क्यूं तेरी याद का बादल मेरे सर पर आ गया
अहमद मुत्ततक

कब धूप चली शाम ढली किस को ख़बर है
इक उम्र से मैं अपने ही साए में खड़ा हूँ
अख्तर होशियारपुरी

नक़ाब-ए-रुख़ उठाया जा रहा है
वह निकली धूप साया जा रहा है
बढ़-उल क़ादरी

ये इंतिक़ाम है या एहतेजाज है क्या
ये लोग धूप में क्यूं हैं शजर के होते हैं
हसे सोज

सारा दिन तपते सूरज की गर्मी में जलते रहे
ठंडी ठंडी हवा फिर चली सो रहो सो रहो
शकीर काज़मी

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धूप बोली कि मैं आबाई वतन हूँ तेरा
मैंने फिर साया-ए-दीवार को ज़हमत नहीं दी
फ़िरहत एहसास (दान / रेखना)





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