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शिशु का हर क़दम अहम है: बेहद महत्वपूर्ण होते हैं बचपन के पहले तीन साल, शिशु का समझें व्यवहार और स्वस्थ विकास पर ध्यान दें


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  • बचपन के पहले तीन साल बहुत महत्वपूर्ण हैं, बच्चे के व्यवहार और स्वस्थ विकास पर ध्यान दें

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डॉ। प्रियंका जैन2 घंटे पहले

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  • शिशु को कितना कुछ होता है। खड़े होने, चलने, बोलने का कौशल सीखने की कलाद बनाने के लिए उसके पास होते हैं तीन-चार साल।
  • विकास के इस दौर का हर पड़ाव मील का पत्थर होता है। इसके क्रम पर ध्यान देने अभिभावकों की ज़िम्म सूची है ताकि शिशु का स्वस्थ विकास सुनिश्चित किया जा सके।

पहला शब्द बोलने से लेकर पहले शब्द लिखने तक, हाथ-पैर हिलाने से लेकर चलने तक, सिर संभालने से लेकर शरीर का संतुलन समझने तक, शिशु के विकास पर नज़र ज़रूरी है। बचपन के पहले तीन साल बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इसी उम्र में बच्चे बहुत सारा सीखते हैं और यह उनकी खोज बढ़ाने और विकास की संकल्पना होती है। बढ़ती उम्र के साथ बच्चों के व्यवहार में बदलाव, विकास, विकलांगताएं देना, बोलना जैसे तमाम पहलू हैं, जिनपर माता-पिता की झलक होनी चाहिए। अगर विकास की प्रक्रिया सामान्य न हो, तो ये विकार बन सकते हैं। हालांकि यह आकलन केवल जांच के बाद ही कर सकता है। अभिभावक पूरा ध्यान दें, तो बच्चे में सुनने-बोलने में परेशानी, हकलाना, सीखने में विलम्ब, समझने की दिक़्क़तें इस दौरान आसानी से समझी जा सकती हैं।

नन्ही बोली की शुरुआत

वास्तव में बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास एक व्यापक अवधारणा है और इस विकास के साथ किसी समस्या का सामने आना एक जटिल विषय है। ऐसे में ज़रूरी है कि मूल रूप से पहले बच्चों के बोलने और सुनने के विकास क्रम को एक-एक कर समझा जाए और उसके साथ-साथ लक्षणों को समझा जाए …

  • 3 महीने का बच्चा आवाज़ें निकालना शुरू कर देता है।
  • 6 महीने का बच्चा अकेला एक बहुत से अक्षर बोलने लगता है, जैसे माँ, पा, बा आदि।
  • 9 महीने का बच्चा दो ट्रैक्टर से बनने वाले टूटे-फूटे शब्दों का उच्चारण कर सकता है जैसे मामा, पापा, बाबा आदि।
  • डेढ़ साल का होते-होते बच्चा दो शब्दों को जोड़ कर कुछ-कुछ सार्थक शब्द बोलने का लगता है।
  • दो साल की उम्र तक आना-आना बच्चा 3 शब्दों वाले टूटे-फूटे लेकिन सार्थक वाक्य बोल सकता है। उसका शब्दकोष 30 से 40 सुने-सुनाए शब्दों का हो सकता है।
  • तीन साल तक आते-आते बच्चे का शब्दकोष लगभग 60 से 70 सुने-सुनाए शब्दों का होना चाहिए।
  • बच्चे को उम्र के इन पड़ावों पर बोलने में किसी तरह की समस्या आई तो इसको नज़रअंदाज़ ना करें। डॉ। की सलाह लें। हालांकि, हर बच्चे का विकास थोड़ा अलग हो सकता है, सो डॉ सही परामर्श करेगा।

आवाज से भी चौंकिए नहीं

चंद समस्याओं पर ग़ौर करें, जैसे अगर बच्चा बोलता हो लेकिन कहने पर कुछ बातों का जवाब नहीं देता, या अजीब सी ही कुछ प्रतिक्रिया देता हो और यह बार-बार हो रहा हो तो डॉक्टर को बताएं। या उम्र के पड़ावों के अनुसार बच्चा बोल तो रहा है लेकिन किसी तरह की आवाज़ सुनकर चौंकता नहीं या कोई प्रतिक्रिया नहीं देता या ज्यादातर इशारों में जवाब देता है, या उसके आस-पास कोई सामान गिर जाए तो देखता नहीं या प्रतिक्रिया ही नहीं देता। जाहिर तौर पर बच्चे को सुनने या समझने में समस्या है। ऐसे में डॉ की सलाह लेने के साथ माता-पिता बच्चे की मदद कर सकते हैं। इसके अलावा बच्चे की हर किस्म की भी संज्ञान लें। उसे सुनाई नहीं देने के कारण कोई आकस्मिक ना हो, इसका ख़तरात पर ध्यान रखें। इलाज के साथ-साथ बच्चे की पढ़ाई में बदलावों पर ध्यान दें। अक्सर बहुत ध्यान से ध्यान देने पर पता चलता है कि वास्तव में बच्चे की स्थिति में सुधार हो रहा है या स्थिति स्थिर है।

जब बच्चा कोई विकलांगता ही नहीं देता है …

जब बच्चा बोलता तो हो लेकिन ना तो प्रतिक्रिया देता हो, ना ही कोई सार्थक बातें करता हो, बात भी अजीब तरीके से करता हो या कई बार इशारों में बात करता हो, तो ये बहुत हद तक ऑटिज़म के लक्षण हो सकते हैं। इस तरह के लक्षण

बोलने में गर बच्चा अटकता है …

यह आधुनिक भी हो सकता है और गंभीर भी। बच्चे अक्सर उत्सुकता में बहुत जल्दी-जल्दी बोलते हैं या अटक-अटक कर बोलते हैं। ये भी हो सकता है कि बच्चे में मस्तिष्क संबंधी कोई समस्या या मस्तिष्क का ग्रहणशील क्षेत्र यानी रिसेप्टिव एरिया में किसी प्रकार की कोई समस्या हो। कई बार ये समस्या दिमागों पर लगी या फिर स्ट्रोक के कारण भी हो सकती है। ऐसे में इलाज में देरी नहीं करें। इलाज के साथ-साथ बोलने की काफी हदें हैं।

बोलने का अभ्यास करने वाले व्यक्ति – दवाइयों के साथ-साथ स्पीच थैरेपिस्ट द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें। बच्चे से बातें करें। इसकी शुरुआत कम-कम शब्दों से करें। कोशिश करें कि वो अटके बिना बोलने की कोशिश करे, जो धीरे-धीरे अभ्यास के साथ मुमकिन होगा। जल्दबाज़ी में बच्चे पर लगातार शब्दों का अंबार ना थोपें।

सीसा-कारण संतुलन बिगड़ रहा है

जिस उम्र में बच्चे को अच्छी तरह से चलना सीखना जाना चाहिए, लेकिन वह थोड़ा चलकर गिर जाता है और संतुलन नहीं बना पाता है, तो यह बैलेंस डिसऑर्डर कहता है। यानी ऐसा विकार जिसमें बच्चा चक्कर आना, धुंधली दृष्टि, धुंधलापन और बार-बार गिरने जैसी समस्या से जूझता है। ज़्यादातर ये कान में किसी प्रकार के वायरल या बैक्टीरिया के संक्रमण, सिर पर चोट, दिमाग में किसी तकलीफ़ के कारण होता है। ऐसे में विशेषज्ञ जांच द्वारा समस्या का कारण जानते हैं और साथ में संतुलन के लिए व्यायाम भी बताते हैं।

शिशु के विकास को लेकर अगर आपके मन में कोई शंकाएं हों, तो डॉक्टर से परामर्श करें। हो सकता है कि कोई समस्या ही न हो। हर शिशु अलग होता है, सो थोड़ा बहुत अंतर सबके विकास में हो सकता है।

विकास के लिए कुछ प्रयास

मोटर स्किल बढ़ाते हैं

मोटर स्किल से बच्चों की आँखों और उनके हाथों, पैर पैरों आदि के बीच तालमेल विकसित होता है। चीजों को उठाना, पेन-पेंसिल से लिखना, डोरी पकड़ना, लय में ताली बजाना, मसाले से आसानी से खाना जैसे समन्वय मोटर स्किल के अंतर्गत आते हैं। बच्चों से पेंटिंग, क्राफ्टिंग कराएं जिससे उनके हाथों और आंखों के बीच समन्वय बनेगा। इसी तरह से खेलने वाली मिट् टीटी, बॉल ब्लॉक्स से आकृति बनाना, जिन में बने कई छेदों से रेसिंग आर-पार करना जैसे खेल खिलाना। ये एक तरह से बच्चे के संपूर्ण विकास के मददगार व्यायाम हैं।

सोशल स्किल विकसित करें

बच्चों के विकास में सोशल स्किल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बच्चों को अलग-अलग तरह की ऐक्ट रेज में शामिल करें और हम उम्र के बच्चों के साथ खेलने से रोके नहीं। अगर बच्चा किसी से बात करने में हिचकिचाता है, तो उसकी हिम्मत बढ़ जाती है और उसकी झिझक को दूर करने की कोशिश की जाती है।

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