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संत रविदास जयंती आज: भक्ति करना चाहते हैं तो मन को शांत रखें, अशांत मन की वजह से किसी भी काम में एकाग्रता नहीं बनती है।


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15 मिनट पहले

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  • मास मास की पूर्णिमा पर हुआ था संत रविदास का जन्म, समाज सेवा के लिए समर्पित किया था पूरा जीवन

शनिवार, 27 फरवरी को माघ मास की पूर्णिमा है। इस तिथि पर संत रविदास की जयंती मनाई जाती है। रविदासजी ने कई ऐसे सूत्र बताए हैं, जिन्हें अपनाने से हमारे कई दुख दूर किए जा सकते हैं। उनके जीवन से जुड़े कई अनिश्चित प्रसंग भी प्रचलित हैं। जानिए रविदासजी का एक चर्चित प्रसंग …

संत रविदास की कुटिया में जो भी आता था, वे उनकी पूरी मन से सेवा करते थे। एक दिन उनकी कुटिया में एक सिद्ध महात्मा ने खाना खाया। खाने के बाद रविदासजी ने महात्माजी को अपने बनाए हुए जूते भी पहनाए।

इस सेवा से प्रसन्न होकर महात्माजी ने संत रविदास को एक ऐसा पत्थर दिया। जिसकी मदद से लोहे के सोने में बदल जाता था। इसे पारस पत्थर कहा जाता है।

रावदासजी ने ये पत्थर उठाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर मेरे औजार सोने के हो जाएंगे तो मैं जूते-चप्पल कैसे बनाऊंगा?

महात्माजी बोले कि यह पत्थर से तुम धनी बन सकते हो। आपको जूते-चप्पल बनाने की जरूरत ही नहीं है। जब आप धनवान हो जाओगे तो समाज में जरूरतमंद लोगों की मदद कर पाओगे। जब चाहो इसका उपयोग कर लेना। ऐसे कहकर महात्माजी ने पारस पत्थर वही कुटिया में एक ऊंची जगह पर रख दिया। इसके बाद महात्मा जी वहाँ से चले गए।

कुछ महीनों के बाद जब वे महात्मा फिर से संत रविदास की कुटिया पहुंचे। उन्होंने देखा कि रावदास की हालत वैसी की वैसी ही है, जैसे पहले थी। महात्माजी ने पूछा था कि आपने पारस पत्थर का उपयोग नहीं किया, वह पत्थर कहां है?

रावदासजी ने कहा कि वह पत्थर तो वहाँ होगा, जहाँ आप रखे थे। महात्माजी ने पूछा था कि आपने इसका उपयोग क्यों नहीं किया?

रविदासजी बोले कि गुरुदेव, अगर मैं बहुत सारा सोना बना लेता हूँ और धनवान हो जाता तो मुझे धन की चिंता रहती। कहीं ये धन न ये चुरा न ले। इसकी देखभाल करनी चाहिए।

अगर मैं धन का दान करता हूं तो बहुत जल्दी ये बात पूरे क्षेत्र में फैल जाती है। लोग दान लेने के लिए मेरे घर के बाहर खड़े रहते हैं। इतना सब होने के बाद मैं भक्ति में मन नहीं लगा पाता। मैं तो जूते बनाने के काम से ही प्रसन्न हूं, क्योंकि इस काम से मेरे खाने-पीने की पर्याप्त व्यवस्था हो जाती है और बाकी समय में मैं भक्ति कर लेता हूं।

अगर मैं धनी हो जाता हूं तो प्रसिद्धि मिल जाती है और फिर मेरे जीवन की शांति खत्म हो जाती है। मुझे तो शांति चाहिए, इसलिए मैं भक्ति कर सकूं। इस कारण मैंने पारस पत्थर को हाथ भी नहीं लगाया।

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