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सरकारी बिज़नेस के लिए प्राइवेट बैंकों को मिले मौके से क्यों बढ़ी है PSBs की चिंता?


नई दिल्ली. हाल ही में केंद्र ने कहा है कि सरकारी बिज़नेस में प्राइवेट क्षेत्र के बैंक भी हिस्सा ले सकेंगे. ट्रेड यूनियन सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं. प्राइवेट बैंक पहले कुछ चुनिंदा सरकारी लेनदेन में हिस्सा ले सकते थे, लेकिन अब सरकार के सभी बिज़नेस के लिए उनका रास्ता साफ हो गया है. पहले यह पब्लिक सेक्टर बैंकों तक ही सीमित रहता था. सरकार का बिज़नेस बहुत बड़ा है. इसमें लेनदेन का काम सरकारी बैंकों के अलावा कुछ सरकारी विभागों के भी जिम्मे भी है.

सरकारी बैंकों की चिंता क्यों बढ़ गई है?
दरअसल, केंद्र के इस फैसले से पब्लिक सेक्टर बैंकों को कई तरह के सरकारी लेनदेन के जरिए होने वाली कमाई घट जाएगी. सरकार की कई तरह की सोशल बैंकिंग स्कीम इन बैंकों की कमाई का एक बड़ा जरिया होता है. अब इसका कुछ हिस्सा प्राइवेट बैंकों की झोली में भी जाने वाला है. ऐसे में अब इन सरकारी बैंकों के लिए इस श्रेणी में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ जाएगी.

बैंक यूनियनों का कहना है कि सरकारी बिज़नेस का फैसला तभी सही होगा, जब सभी बैंकों को सरकार के सोशल बैंकिंग एजेंडे में शामिल किया जाएगा. इसमें निष्क्रिय पड़े जन धन अकाउंट से लेकर कई तरह के कल्याणकारी स्कीम्स को भी शामिल किया. वर्तमान में इसका बोझ सरकारी बैंकों को ही उठाना होता है.पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकार की बड़ी हिस्सेदारी

दरअसल, सरकारी बैंकों के मालिकान ढांचे में अंतर की वजह से इस तरह की स्थिति बनी है. अधिकतर पब्लिक सेक्टर बैंकों में सरकार की बड़ी हिस्सेदारी है. 31 दिसंबर 2020 तक 10 पब्लिक सेक्टर बैंकों में 70 फीसदी की हिस्सेदारी सरकार के पास है. तीन बैंकों में तो यह 90 फीसदी से भी अधिक है. कई बार यह कहा जाता है कि सरकारी बैंक वित्त मंत्रालय की एक ईकाई की तरह ही काम करते हैं.

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इन बैंकों का बिज़नेस को लेकर फैसला, खासतौर से कल्याणकारी योजनाओं का पालन करना केंद्र के इशारों पर ही होता है. यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि इन बैंकों में कई फैसले सरकार के आदेश पर ही होते हैं. जन धन बैंक अकाउंट को लेकर भी कुछ ऐसा ही हुआ. एमएसएमई सेक्टर के लिए 3 लाख करोड़ रुपये के लोन से लेकर रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाकर कमाई करने वालों के लिए 10,000 करोड़ रुपये के लोन योजना भी इन्हीं में शामिल है.

सबसे जोख़िम वाले कर्ज़ का बोझ सरकारी बैंकों पर
हालांकि, ये आदेश कभी भी औपचारिक रूप में नहीं होते हैं. बैंक अधिकारियों को उनका टार्गेट पूरा करने के लिए ही कहा जाता है. पब्लिक सेक्टर बैंकों में कामकाज के समय का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं सरकारी योजनाओं को पूरा करने में खप जाता है. इससे उनके परफॉर्मेंस पर भी असर पड़ता है. इंडस्ट्रीज और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग को लेकर यही आलम देखने को मिलता है. इन सरकारी बैंकों में फंसे कर्ज का हिस्सा इतना बड़ा इसलिए भी होता है, क्योंकि ये छोटी कंपनियों से लेकर सरकार के बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए भी कर्ज देते हैं. दूसरी ओर, प्राइवेट बैंक कम ही ऐसे जोख़िम उठाते हैं.

उदाहरण के तौर पर देखें तो सरकार के फाइनेंशियल इनक्लुज़न प्रोग्राम के तहत सरकारी बैंकों में 42 करोड़ जन धन अकाउंट खोले गए. जबकि, प्राइवेट बैंकों में केवल 1.25 करोड़ ही ऐसे अकाउंट्स खोले गए हैं. बैंक कर्मचारी संघ द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से इस बारे में जानकारी मिलती है.

ग्रामीण इलाकों में सरकारी बैंकों की पहुंच
इनमें से अधिकतर बैंक अकाउंट ज़ीरो-बैलेंस अकाउंट्स होते हैं और बैंकों को इन्हें मेंटेन करने के लिए 60 से 70 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. कई तरह के कल्याणकारी योजनाओं के तहत कमज़ोर वर्ग को ये बैंक कम ब्याज दर पर कर्ज़ देते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में इन बैंकों को संचालन का भी बोझ होता है. अधिकतर प्राइवेट बैंक अपना संचालन शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रखते हैं. सरकारी बैंकों के लिए ऐसा नहीं है.

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अगर पब्लिक सेक्टर बैंक सरकार के निर्देशों का पालन न करें तो…?
मध्य प्रदेश के बैंकर्स कमेटी ने वित्त सेवा सचिव को एक लेटर लिखकर बताया कि भारतीय स्टेट बैंक के मगरिया ब्रांच को 22 फरवरी के दि जिला अधिकारियों द्वारा सील कर दिया गया. इसका कारण यह था कि इस ब्रांच ने प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि और मुख्यमंत्री रूरल स्ट्रीट वेंडर स्कीम के तहत वेंडर्स को फंड नहीं मुहैया कराया था. इस ब्रांच ने कई बार रिमाइंडर के बाद भी औपचारिकताओं को नहीं पूरा किया था.

स्थानीय ज़िला मजिस्ट्रेट ने पुलिस की एक टीम के साथ जाकर बैंक कर्मचारियों को बाहर निकालते हुए ब्रांच को सील कर दिया था. ज़िला प्रशासन द्वारा तो प्रत्यक्ष कारण बताते हुए कहा गया कि यह ब्रांच आवासीय प्रॉपर्टी से संचालित किया जा रहा था.

सोशल बैंकिंग स्कीम्स में प्राइवेट बैंक क्यों नहीं हिस्सा लेते?
प्राइवेट बैंक अपने जोख़िम और मुनाफे में सांमजस्य बिठा कर चलते हैं.
अगर सरकार चाहती है कि पब्लिक सेक्टर बैंक भी प्राइवेट बैंकों की तरह ही काम करें तो उनके लिए समान स्तर का सिस्टम भी तैयार करना होगा. केंद्र के प्राइवेट सेक्टर द्वारा सरकारी बिज़नेस में हिस्सा लेने को इसी रूप में देखा जा रहा है.





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