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1971 की जंग के जांबाज नहीं रहे: मैडमति की लड़ाई के हर कर्नल भट का निधन, उनकी टुकड़ी ने पाकिस्तानी टैंक ब्रिगेड को रोका दिया था


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जोधपुर2 घंटे पहले

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कर्नल श्याम सिंह भाट। -फाइल फोटो

पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति के लिए वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध के दौरान मैमति की प्रसिद्ध लड़ाई लड़ी गई थी। इसके हर कर्नल श्यामसिंह भाट का गुरुवार देर रात निधन हो गया। वे 80 साल के थे। जोधपुर के तपू गांव में साल 1941 में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता ठाकुर खेतसिंह भाटी जोधपुर रियासत की सरदार इन्फैंट्री में अफसर थे। उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था।

कर्नल श्याम सिंह की शिक्षा जोधपुर में ही हुई थी। वर्ष 1963 में उन्होंने भारतीय सेना की सबसे पुरानी राजपूताना रायफल से अपना सैन्य जीवन शुरू किया। वर्ष 1965 और 9171 के भारत-पाक युद्ध में अपनी साहसुरी की मिसाल पेश की।

सेना में 34 साल तक सेवा देने के बाद वे जीवन भर युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित करते रहे। सैन्य पृष्ठभूमि वाले परिवार के कर्नल श्याम सिंह के बेटे कर्नल संग्राम सिंह का पिछले महीने निधन हुआ था। कर्नल संग्राम को वर्ष 1999 में करगिल युद्ध के दौरान दिखाई वीरता के लिए शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था।

लेफ्टिनेंट जनरल ओपी कौशिक ने बतायाई हमुरी की दास्तान
वर्ष 1971 में 9 दिसंबर की रात हुई मैडमति की लड़ाई के बारे में लेफ्टिनेंट जनरल ओपी कौशिक ने एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने बताया- मैमेति में राजपूताना राइफल्स की टुकड़ी ने मेजर श्याम सिंह के नेतृत्व में महत्वपूर्ण स्थान पर कब्जा जमा लिया था, लेकिन पाकिस्तान की एक पूरी ब्रिगेड ने इस टुकड़ी को घेर लिया। शुरू में यह माना गया कि यह पाकिस्तान की एक कंपनी है, लेकिन बाद में पता चला कि पूरी टैंक ब्रिगेड ने उन्हें घेर रखा है। ऐसे में मेजर श्याम सिंह ने हेड क्वॉर्टर से मदद मांगी। लेकिन पीछे से मदद पहुंच पाने की संभावना नहीं थी।

भारतीय टैंक आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। अन्य टुकड़ियां दूसरे मोर्चों पर जंग लड़ रही थीं। कंपनीधरर ने एयरफोर्स से मदद मांगी, लेकिन वे उस वक्त ढाका पर बमबारी कर रहे थे। राजपूताना राइफल्स के 38 युवा शहीद हो चुके थे। दुश्मन के टैंक महज 200 फीट की दूरी पर खड़े थे। बाकी सैनिकों के बचने की भी कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। ऐसे में ब्रिगेडैंडर ने कोरेंडरर लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह को इस बारे में सूचना दी। कोरंदरर सगत सिंह, ब्रिगेडैंडर ब्रिगेडियर पांडे और एंड्रिंग ऑफिसर बरार ने वहां से पीछे हटने के लिए मेजर श्याम सिंह को आदेश दिया।

मेजर श्याम सिंह ने तुरंत मना कर दिया और कहा कि वे जब तक जिंदा हैं, पीछे नहीं हटेंगे। मेजर भाटी ने कहा कि इस जगह पर हमने बहुत मुश्किल से कब्जा जमाया है। अब पीछे हटते ही सामने खड़े टैंक हमें उड़ा देंगे। दुश्मन के टैंक 200 फीट की दूरी पर खड़े हैं। हम पर गोले बरसा रहे हैं। कर्नल बरार ने कहा कि यदि पीछे नहीं हटे तो यह आपकी जिम्मेदारी मानी जाएगी। मेजर भाट ने पूरी जिम्मेदारी लेते हुए साफ कर दिया कि वे अपनी जगह नहीं छोड़ेंगे।

लेफ्टिनेंट जनरल ओपी कौशिक ने लिखा है कि बाद में यह साबित हो गया कि मेजर भाट का फैसला ही सही था। उसी समय हमने एयरफोर्स को रेडियो संदेश भेजा। जवाब मिला कि वे अपने पूरे बम ढाका पर गिरा चुके हैं। एक भी बम उनके फाइटर जेट्स में नहीं है। हमने कहा कि वे पाकिस्तानी टैंकों के ऊपर से बहुत नीची उड़ान भरते हुए खौफ पैदा कर दे। भारतीय पायलट्स ने ऐसा ही किया।

उन्होंने दो-तीन बार टैंकों के ऊपर से बहुत नीची उड़ान भरने का संदेश दिया कि हम पहुंच गए हैं। थोड़ी देर में पाकिस्तानी टैंक ब्रिगेड के पीछे हटना शुरू हो गया है। इस बीच भारतीय टैंक वहां पहुंच गए और भारतीय सेना ने सामरिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले मैमाती पहाड़ी पर अपना कब्जा बरकरार रखा।

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