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Book Review : गाद से लेकर जड़ी-बूटियां तक ढोती हैं ‘तीस पार की नदियाँ’


वैसे तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर मुड़कर जब आप पिछले दो साल या उससे ज्यादा का आकलन करते हैं, तो खुद के बारे में यही राय बनाते हैं कि आप कितने अपरिपक्व थे. आपको अपनी तमाम नादानियां याद आती हैं, जिनपर कभी तो आप मुस्कुराते हैं या कभी झुंझलाते हैं. लेकिन 30 की उम्र में ऐसी क्या खास बात है, जिसे रेखांकित की जाए? उसे एक विशेष पड़ाव की तरह देखा जाए? यह सवाल सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ के कविता संग्रह ‘तीस पार की नदियाँ’ शीर्षक देखने के बाद उठी. सत्या के कविता संग्रह का यह नाम उनकी कविताओं को लेकर एक पूर्व धारणा बनाने का काम करता है. एक उम्मीद जगती है कि इस संग्रह में स्त्री संसार के कुछ अनछुए पहलुओं से सामना होगा. हालांकि पूरे संग्रह में ऐसी कोई प्रस्तावना या ऐसा कोई संकेत कवयित्री ने अपनी ओर से नहीं दिया है. यह तो सहज पाठकीय उम्मीद है, आलोचकीय नहीं.

बहरहाल,  इन पड़ावों को उन्होंने अलग-अलग उपशीर्षक दिए. इन उपशीर्षकों के तहत कुल 57 रचनाएं संकलित हैं. पहला पड़ाव है ‘मायके की चौखट’. इसके तहत 5 कविताएं हैं. भाई, पिता और मां से जुड़ी इन कविताओं में रचनाकार अपने मायके की स्मृतियां पलटती दिखती हैं, उन्हें जीती हुई दिखती हैं. वह मायके की दहलीज से निकलने के बाद पिता को याद करते हुए उनकी जीवन शैली अपनाकर पिता हो जाना चाहती हैं.

दूसरा पड़ाव है ‘स्त्रियां गढ़ती हैं खाली पलों में भविष्य के सुनहरे सपने’. इस कड़ी में 10 कविताएं हैं. इन कविताओं के मर्म सपने और सवाल हैं. कवयित्री ने इनकी शृंखला कुछ ऐसे रची हैं कि 10 कविताएं मिलकर एक स्त्री रच देती हैं. इस उपशीर्षक की पहली कविता ‘स्त्री’ में तीन कविताएं हैं. इन कविताओं में सत्या बताती हैं कि स्त्री क्या होती है. ‘स्त्री’ शीर्षक की पहली कविता में वह दुनिया है, जिसे पाने के लिए स्त्री आज भी संघर्ष कर रही है. दूसरी कविता में संघर्ष करती स्त्री है और तीसरी कविता उम्र के उस पड़ाव की है, जहां छले जाने का अहसास गहरा और तीखा होता है, मोहभंग की पीड़ा साथ होती है. वह लिखती हैं-

चालीस-पचासउम्र की प्रौढ़ा होती स्त्रियाँ
कभी-कभी होती हैं उदास

कुछ खाली-खाली-सा होता है अंदर
एक वीराना सा उपजता है
मन के भीतर

और हो जाती हैं अनमनी-सी…

‘मैं माँ होना चाहती हूँ’ शीर्षक कविता में कवयित्री स्थापित करती है कि मां बनना मात्र एक जैविक प्रक्रिया है, लेकिन मां होना स्त्री प्रकृति है. ठीक इसके बाद की कविता ‘स्त्री तुम क्या होना चाहती हो’ में कवयित्री उन सवालों से जूझती नजर आती है, जिसका सामना सदियों से स्त्री कर रही है. वह खुद से भी और समाज से भी सवाल करती है कि स्त्री होना क्या होता है? कवयित्री का यह सवाल कोई नया सवाल नहीं है. सदियों से यह सवाल स्त्री मन का पीछा कर रहा है. अपने अस्तित्व की तलाश में जुटी स्त्री लगातार इस मर्दवादी समाज का दबाव झेल रही है. लेकिन सच है कि यह स्त्रियों की नाकामी नहीं है बल्कि यह इस भारतीय समाज की निर्लज्जता है, जिसके केंद्र में भारतीय मर्द हैं. कवयित्री का सवाल उस भारतीय सभ्यता से है जो स्त्री को परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर बांध कर रखना चाहता है. जो उसके अस्तित्व को उसकी देह तक सीमित रखना चाहता है. वह पूछती है –

क्या यही होता है
स्त्री होना कि
अपने लंबे घने केशों को
जल्दी से बाँध
सुबह के अंधेरे में ही उठ जाना
और समेटना सारे कामों को
बगैर ही थके
सबकी जरूरतों में ढलते जाना
अंतरंग क्षणों में पूर्णत:
समर्पित हो जाना
क्या यही है स्त्री हो जाना?

इस दौर की कवयित्रियों में या इससे पहले की पीढ़ी की महिला रचनाकारों में भी अपने अस्तित्व की तलाश करती ऐसी अभिव्यक्तियां मिल जाएंगी. ऐसे सवाल से जूझती रचनाकारों में इस समाज के प्रति कभी क्षोभ नजर आएगा, तो कभी जुगुप्सा. कई बार मौन और कई बार मुखर विरोध के स्वर भी सुनाई पड़ेंगे आपको. सत्या की कविता ‘स्त्री तुम क्या होना चाहती हो’ में आपको स्त्री जीवन के कई शेड्स मिल जाएंगे. अंतर्द्वंद्व भी है, समर्पण भी है और अंततः किसी नतीजे तक पहुंचने से पहले समझौता भी दिखेगा. अतंर्द्वंद्व से भरी ये पंक्तियां देखिए –

पर! वो क्या है?
जो पनपता है अचानक
एक स्त्री के अंदर
कुछ अनसुलझा-सा प्रश्न
घने केशों के बीच
नये रास्ते तलाश करता है बेचैन मन
बड़ी-सी बिंदी के पीछे से
झांकता है
आत्मसम्मान का स्वप्न
आंखों में ढूंढता है
स्वअस्तित्व की चमक
अक्सर होठों पर गुनगुनाता है
अपने लिए कोई गीत…

इस संग्रह की एक कविता है ‘औरतें नहीं करतीं आत्महत्या’. नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े पहली नजर में इस कविता को झुठलाते नजर आते हैं. राज्यों से मिले आंकड़ों के आधार पर उसने बताया है कि 2019 में देशभर में कुल 44085 महिलाओं ने आत्महत्या की. एनसीआरबी के इन्हीं आंकड़ों में यह भी है कि 2019 में कुल 103059 पुरुषों ने खुदकुशी की है. इस लिहाज से देखें तो पुरुषों की तुलना में देशभर में आधे से कम महिलाओं ने आत्महत्या की है. अब यह बात हमसब निजी अनुभवों से जानते हैं कि किसी भी मर्दवादी समाज में स्त्रियों के बढ़ने के रास्ते मुश्किलों से भरे होते हैं. उनके हिस्से तरह-तरह की जलालतें आती हैं. इस समाज में महिलाओं का यौन उत्पीड़न – हमसब के लिए जैसे रोजमर्रा की खबर हो चली है. तिसपर दुखद यह कि हम पुरुषों ने इन अपराधों को स्त्री की शुचिता और अपनी इज्जत से जोड़कर देखने की ट्रेनिंग पाई है. स्त्री भी अपने भीतर इन अपराधों को इसी रूप में देखने की आदी रही है. ऐसे में जब ऐसी कोई वारदात किसी स्त्री के साथ घटित होती है, तो उसे बचपन में घुट्टी की तरह पिलाई गई यौन-शुचिता के सबक याद आते हैं और वह भी इस वारदात को घर-परिवार की इज्जत के तार-तार होने से जोड़कर देखती है. ऐसे में अधिकतर पीड़ितों के सामने आत्महत्या के अलावा कोई चारा नहीं होता. जाहिर है कि यौन उत्पीड़न को देखने की यह दृष्टि दोषपूर्ण है. पर ऐसी ही दोषपूर्ण दृष्टि की वजह से खुदकुशी के 44085 केसों में कम से कम 20000 महिलाएं ऐसी रही होंगी, जिन्होंने यह रास्ता अख्तियार कर लिया. सत्या भी अपनी कविता में ऐसी ही बात कहती हैं. वह बताती हैं कि सामान्य तौर पर महिलाएं आत्महत्या नहीं करतीं, क्योंकि वे नीलकंठी होती हैं. तमाम तरह के विष पीती रहती हैं. जहर उगलना नहीं जानतीं, बस हलक में दबाए रखती हैं ताउम्र. अपनी इस कविता के शुरू में ही वह लिखती हैं –

हाँ, अक्सर औरतें नहीं करतीं आत्महत्या
क्योंकि बचपन से ही उन्हें पता होता है कि
उनके कुल की मर्यादा बंधी है
उसके गले में
उसी जगह,
जहां लगानी होती है
रस्सी की मजबूत गाँठ…

घर-परिवार और बच्चों के चक्रव्यूह में पिसती हुई औरत सत्या शर्मा ‘कीर्ति’ की कविताओं में बार-बार आती है. लेकिन उनकी कविताओं की स्त्री अब इस साजिश को समझने लगी है. वह नादान नहीं है. तीस की उम्र पार करतीं ये औरतें अब इन साजिशों को पहचानने लगी हैं. वह अब देवी का दर्जा नहीं पाना चाहती, बल्कि वह कहती है कि उसकी देह में भी एक धड़कता हुआ दिल है, उसकी भी रुचियां हैं, उसकी भी ख्वाहिशें हैं, उसके भी सपने हैं. तो उसे इनसान के तौर पर ही देखा जाए. तभी तो सत्या की स्त्री स्वीकारती है –

हाँ, हूँ मैं माँ
पर! त्याग, बलिदान की
प्रतिमूर्ति नहीं हूँ मैं
जीती-जागती
खुद को भी निखारती
समय के साथ ढलती
बच्चों के साथ दौड़ती-भागती सी
हूँ मैं माँ…

इस संग्रह में 8 कविताएं ‘तुम्हारे मन के किवाड़ पर दस्तक तो होती होगी ना’ उपशीर्षक के तहत दर्ज हैं. इस पड़ाव की अधिकतर कविताएं स्त्री मन के संशय की कविताएं हैं. पुरुषों के संदिग्ध भरोसे की कविताएं हैं. ‘मुझमें तुम’ शीर्षक कविता के तहत तीन कविताएं हैं. पहली कविता देखें –

सुनो ना!
मेरे मन की
गीली मिट्टी
से बने
चूल्हे पर
पकता
हमारा-तुम्हारा प्यार
हर बार मुझे
एक नए
स्वाद से
भर देता है
पता है तुम्हें?

पुरुषों की संवेदनशीलता को लेकर बना सदियों पुराना संदेह आज भी कायम है. वह स्त्री मन को समझ भी सकेगा – यह अब भी संदिग्ध है. इसे स्त्री के शक करने का गुण या अगुण नहीं कहा जा सकता. बल्कि कहना चाहिए कि पुरुष अब तक महिलाओं का भरोसा नहीं जीत सका है. वह पहले भी संदिग्ध था, आज भी संदिग्ध था. यही वजह है कि स्त्री को अपने मन की परतें खोलनी पड़ रही हैं और उसके साथ ही वह सवाल कर रही है – ‘पता है तुम्हें?’.

पर यह जो स्त्री है, वह हर पल समझौता करती है. रिश्ते बचाए रखने के लिए, मान-मर्यादा बचाए रखने के लिए वह झुलसते हुए भी लौट आती है पुरुषों का सहारा बनकर. आशंकाओं, उम्मीदों और कल्पनाओं का कोलाज समेटे स्त्री रिश्तों की रस्सी पर कुशल नटी की तरह बढ़े जा रही है संतुलन बनाती हुई. सत्या लिखती हैं –

कि हाँ, अब सोचती हूँ
लौट भी आऊँ
कि इस बार की सर्दी में बर्फ न बन जाये
हमारे रिश्तों की
गुनगुनी-सी गर्माहट।

इसी संदर्भ की एक दूसरी कविता है ‘तुम पुकार लेना’. इसकी शुरुआत में एक स्त्री का समर्पण देखें –

हाँ, आऊँगी लौट कर
बस तुम पुकार लेना मुझको
जब बरस रही हों यादें
कुहासे संग किसी अँघेरी
सर्द रात में
और वह ठंडा एहसास जब
कँपकँपाए तुम्हारे वजूद को
हाँ, पुकार लेना मुझको…

इस संग्रह में ‘अब रातें भी पूछती हैं नींद बेचनी तो नहीं’ उपशीर्षक के तहत छह कविताएं हैं. सच है कि ये कविताएं खबरें पढ़कर, देखकर या सुनकर पैदा हुई बेचैनी से लिखी गई हैं. लेकिन ये कविताएं संवेदना के उस स्तर को छू नहीं पातीं, जहां इस संग्रह की अन्य कविताएं सहज ही पहुंच जाती हैं. हालांकि इस उपशीर्षक की कविता ‘सेल्समैन’ अखिल भारतीय कविता प्रतियोगिता में पहले स्थान पर रही है. इस कविता में सत्या ने एक सेल्समैन के जीवन संघर्ष को स्वर दिया है. इस लंबी कविता के एक अंश में वह ठंड भरी रात का जिक्र करती हैं, जहां पति-पत्नी दोनों को ठंड की वजह से नींद नहीं आ रही. हालांकि दोनों एक-दूसरे से अपनी तकलीफ छुपाते हुए बेसुध सोने का ढोंग करते हैं. इस क्रम में कवयित्री ने लिखा है ‘… जानता हूं उसकी भी आंखें/करती हैं रतजगा/कि इस बार की ठंड रजाइयों में/समा नहीं पा रही…’ – जाहिर है यह अभिव्यक्ति की चूक है. ठंड को तो रजाई में समाना भी नहीं चाहिए, उसे तो रजाई के बाहर ही रहना चाहिए. सत्या लिखना चाहती रही होंगी कि ‘इस बार रजाइयां/ठंड का सामना/नहीं कर पा रहीं’. लेकिन इसी कविता में ठीक इसके बाद एक बेहद मार्मिक और सटीक अभिव्यक्ति भी है, जिसमें इस अभावग्रस्त जोड़े का एक-दूसरे के प्रति प्यार टपक रहा है, चिंता सुलग रही है. सत्या लिखती हैं –

काँपती-सी रात में
अपना भी पुराना कम्बल ढाँप देती है
बच्चों पर और मैं अनदेखा कर
करता हूँ स्वांग सोने का
गिनता हूँ घड़ी की टिक-टिक
कि कब हो सुबह और निकले धूप
जिसमें बैठ मेरी पत्नी सुखाये
रातों की कँपकँपाहट…

बेशक, इस संग्रह में ऐसे कई कंपकंपाते, थरथराते, फड़फड़ाते क्षण हैं, जो स्त्री के संघर्ष को बार-बार रेखांकित करते हैं. उसके त्याग-समर्पण के साथ-साथ उसके सपने भी रचते हैं, उससे हमारा परिचय कराते हैं. कहना न होगा कि तीस पार की नदियों का यह पानी आपको बहाता हुआ स्त्रियों के एक ऐसे संसार में ले जाता है, जहां आप डूबते-उतरते रहते हैं बार-बार. कभी आपको उनके संघर्षों पर गुमां होता है, तो कभी समाज के रवैये से टीस पैदा होती है जो आपको लंबे समय तक उबरने नहीं देती.

कविता संग्रह : तीस पार की नदियाँ
कवयित्री : सत्या शर्मा ‘कीर्ति’
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
मूल्य : 150 रुपये

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