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News18 Special : मोदी जैसे भगोड़ों को भारत लाने में यह हैं बड़ी कानूनी अड़चनें, विकिलिक्स के असांजे का तरीका भी है मौजूद


नई दिल्ली. नीरव मोदी (Nirav Modi). पंजाब नेशनल बैंक (PNB) घोटाले का आरोपी और भगोड़ा. यूके की वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट (Westminster Magistrate Court) के जज सैम गूजी (Sam Goozee ) ने 83 पन्ने के फैसले में मोदी के भारत प्रत्यर्पण (Extradition) की मंजूरी दे दी है. लेकिन कानूनी दांव-पेंज इतने सारे हैं कि प्रत्यर्पण  की राह आसान नहीं है.
न्यूज18 के लिए सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ने सिद्धार्थ आर गुप्ता (Siddharth R Gupta) ने बिट्रेन (UK) और भारत के कानूनों का अध्ययन कर नीरव मोदी के प्रत्यर्पण से जुड़ी संबंधित कानूनी अड़चनें व उपाय बताए हैं. गुप्ता के मुताबिक कानूनी प्रावधानों की वजह से अभी प्रत्यर्पण की लंबी राह है. हालांकि भारत सरकार भी पूरी दमदामी के साथ केस लड़ रही है. उनके मुताबिक कोर्ट ने मामले को विदेश मंत्री प्रीति पटेल के समक्ष भेज दिया है, जो तथ्यों के आधार पर अंतिम फैसला करेंगी कि मोदी को प्रत्यर्पित किया जाना चाहिए या नहीं.
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सबसे पहले जानें प्रत्यर्पण का कानूनी फ्रेमवर्क1. प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 (Extradition Act) भारत में प्रत्यर्पण की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है. इसकी धारा 3 (3) के तहत उन देशों से प्रत्यर्पण का कानूनी आधार मिलता है, जिनके साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि है.
2. यूके प्रत्यर्पण अधिनियम 2003 (UK Extradition Act) में प्रत्यर्पण की प्रक्रिया कैटेगरी 1 और 2 में है. भारत कैटेगरी 2 में आता है इसलिए भारत की ओर से प्रत्यर्पण अनुरोध मिलने पर नामित न्यायालय के साथ-साथ ब्रिटेन के विदेश मंत्री के फैसले की भी आवश्यकता होती है.
3. कैटेगरी 2 वाले देश में प्रत्यर्पण के मामले में (जैसा भारत का मामला है) संबंधित व्यक्ति को प्रत्यर्पित करने की प्रक्रिया कुछ ऐसी है. इसमें ब्रिटेन का मजिस्ट्रेट कोर्ट (जिला न्यायालय) इस बात पर संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी के खिलाफ यूके अधिनियम की धारा 84 के तहत पर्याप्त सबूत हैं. साथ ही, मानवाधिकार पर यूरोपीय कन्वेंशन के अनुच्छेद 3 और अनुच्छेद 6 में कन्वेंशन अधिकारों के अनुरूप है. ऐसी स्थिति में कोर्ट प्रत्यर्पण की अनुमति देने का फैसला करता है और धारा 87 (3) के तहत विदेश मंत्री के पास मामले को भेजता है. यही अभी कोर्ट ने किया है.
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4. विदेश मंत्री को अब अधिनियम में उल्लिखित धारा 93 के अनुसार 2 महीने के भीतर यह तय करना होगा कि व्यक्ति को प्रत्यर्पित किया जाना है या नहीं. हालांकि इसके लिए धारा में बताए गए कारणों पर विदेश मंत्री को गौर करना होगा. इसमें प्रमुख कारण कैटेगरी 2 वाले देश (भारत) में जिस अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है, उसके लिए वहां मृत्युदंड की सजा होने पर आरोपी को प्रत्यर्पित नहीं किया जाएगा. इसी तरह, अपराध का प्रकार भी देखना होगा. जैसे कि केवल उसी अपराध के लिए मुकदमा चलाया जाएगा जिसके लिए उसे प्रत्यर्पित किया गया है. यानी भारत में किसी अन्य अपराध के लिए उस पर मुकदमा नहीं चलेगा.
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नीरव मोदी मामले में आगे इस तरह होगी कार्रवाई

वेस्टमिंस्टर के मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 2003 के यूके प्रत्यर्पण अधिनियम की धारा 87 (3) के तहत मामले को विदेश मंत्री के पास भेज दिया है. यानी अब बिट्रेन की विदेश मंत्री प्रीति पटेल इस पर फैसला करेंगी कि मोदी को अंतत: प्रत्यर्पित किया जाना चाहिए या नहीं. अधिनियम के एस 92 (2) (ए) और (बी) के प्रावधानों के तहत नीरव मोदी को सूचित किया जाएगा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले के खिलाफ यूके हाई कोर्ट में अपील करने का अधिकार है. मोदी को अपील की सूचना विदेश मंत्री की ओर से प्रत्यर्पण पर फैसले को लेकर एस 100 (1) या (4) के अंतर्गत जानकारी मिलने के 14 दिनों के भीतर न्यायालय के नियमों के अनुसार दी जानी चाहिए. हाईकोर्ट के समक्ष इस तरह की अपील विदेश मंत्री द्वारा अंतिम निर्णय लेने के बाद ही सुनवाई के लिए जाएगी. यूके हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद मोदी फिर से यूके सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं. हालांकि यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और अगर यूके का सुप्रीम कोर्ट प्रेयर फॉर लीव से इनकार कर देता है, तब अपील खारिज कर दी जाएगी.
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जूलियंस असांजे समेत दूसरे प्रत्यर्पण मामलों की आड़ ले सकता है मोदी
मोदी वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा भारत प्रत्यर्पित करने के आदेश से बचाव के लिए कई मजबूत दलीलें रख सकते हैं. ये बचाव इस प्रकार हैं:
1. यदि आरोपी की शारीरिक या मानसिक स्थिति ठीक नहीं है कि उसे प्रत्यर्पित करना अन्यायपूर्ण या दमनकारी होगा. इसी दलील के आधार पर विकिलिक्स फाउंडर जूलियन असांजे (Wikileaks founder Julian Assange) को ब्रिटेन से प्रत्यर्पित नहीं किया गया था. हालांकि, मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पहले ही इस मुद्दे पर विचार कर लिया है कि नीरव मोदी को आर्थर रोड जेल, मुंबई में उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध होगी. इसलिए इस दलील के आधार वह अपीलीय कोर्ट के समक्ष आसानी से बचाव नहीं कर पाएगा. फिर भी, इस संबंध में भारत सरकार द्वारा यूके कोर्ट के समक्ष आश्वासन का एक राजनयिक नोट दाखिल किया जाना है.
2. मानवाधिकार पर यूरोपीय कन्वेंशन का अनुच्छेद 3 प्रत्यर्पण वाले देश में जेल की स्थिति को लेकर कुछ शर्तें तय करता है. कैदियों की खराब हालत और भीड़भाड़ वाली जेलों की दलील यूके से भारत प्रत्यर्पित किए जाने वाले व्यक्ति के पास हमेशा रहती है और मोदी निश्चित रूप से इसे अपने पक्ष में पेश कर सकते है. यह दलील फरवरी, 2020 में प्रत्यर्पित किए गए संजीव चावला ने भी दी थी. चूंकि डिस्ट्रिक्ट जज सैमुअल गूज़ी ने अपने फैसले में पहले ही इस बात का उल्लेख किया है कि आर्थर रोड जेल में प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन की स्थितियां लंदन की वैंड्सवर्थ जेल से बेहतर हैं, इसलिए यह दलील भी ब्रिटेन हाईकोर्ट में कमजोर साबित हो सकती है.
3. यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और कैटेगरी 2ए वाले देशों के लिए प्राइमा फेशिया केस की अनिवार्यता नहीं है. लेकिन भारत कैटैगरी 2बी में आने वाला देश है, इसलिए यह साबित करना महत्वपूर्ण है कि भारत में मोदी को दोषी ठहराए जाने के मामले में प्रथम दृष्टया सबूत हैं. मोदी दृढ़ता से कोर्ट में कह सकते हैं भारत सरकार जिन तथ्यों बता रही है, वे अभियोजन के योग्य नहीं हैं.
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कानूनी दांव पेंचों में यह तरीके दांव मोदी को बचा सकते हैं
1. असाइलम यानी शरणार्थी की अर्जी देना
अपने देश में किसी अभियोजन से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यूके में ‘शरणार्थी’ के रूप में रहने के अनुरोध को शरण या असाइलम कहा जाता है. मोदी 2003 के अधिनियम की धारा 121 के तहत शरण के लिए दावा कर सकते हैं. इसमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि एक व्यक्ति को शरणार्थी के रूप में शरण देने की याचिका पर अंतिम फैसला होने तक उसका प्रत्यर्पण नहीं किया जा सकता है. शरण लेने के लिए उसे बहुत स्पष्ट रूप से साबित करना होगा कि भारत में संबंधित अपराध की सजा ब्रिटेन से कहीं अधिक होगी. भारत में जेल की स्थिति बहुत खराब है या भारत में उसका राजनीतिक उत्पीड़न किया जाएगा.
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2. यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स में जाने का उपाय
मोदी ब्रिटेन में फेयर ट्रायल नहीं होने का आधार बनाकर यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ईसीएचआर) में भी अपील कर सकते है. भारत में मोदी के प्रत्यर्पण के बाद भारत उनके ‘राइट टू फेयर ट्रायल’ का हनन होने की संभावना पर भी ईसीएचआर में जाया जा सकता है.





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