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UP News: वाराणसी के संत रविदास मंदिर में लोगों की भीड़ क्यों बढ़ी! जीवन का कारण


वाराणसी के संत रविदास मंदिर में लोगों की भीड़ क्यों बढ़ी!

उन्होंने कहा कि कांग्रेस, भाजपा (भाजपा) और दूसरे पक्षों ने तो हमेशा से ही दलित समाज के संतों की उपेक्षा की है, लेकिन, अब राजनीतिक लाभ लेने के लिए नाटकबाजी कर रहे हैं।

लखनऊ। वैसे तो सालों से दलितों को मोबिलाज करने के लिए अम्बेडकर का नाम लिया जा रहा है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में इसमें एक नाम और जुड़ गया है। संत रविदास (संत रविदास) दलितों के एकलौते भगवान हैं। जहां भी दलितों के मंदिर होंगे वहां भगवान के तौर पर संत रविदास की ही मूर्ति स्थापित होगी। आज माघ पूर्णिमा के दिन उनकी जयंती है। ऐसे में वाराणसी (वाराणसी) के बारे में उनके मंदिर में लोगों की भीड़ लगी है। केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से लेकर प्रियंका गांधी ने मंदिर में जाकर रविदास के दर्शन किए और फर्श पर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। मंदिर जाने का कार्यक्रम अखिलेश यादव का भी है।

नेताओं का संत रविदास के प्रति इनप्रिंटन आखिर क्यों?
रविदास के मंदिर आज के लिए नहीं हैं। फिर पिछले कुछ समय में ही लोगों के इतने चक्कर ऐसे मंदिरों में क्यों लग रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस के बड़े नेता मंदिर आ गया। अखिलेश यादव जाने वाले हैं लेकिन, कोई बात नहीं पहुंची तो वह नेता जो रविदास पर सबसे ज्यादा हक जताती रहे हैं। यानी मायावती। मंदिर में नेताओं की भीड़ को देखकर ही मायावती ने रावदास जयंती के संदेश को याद दिलाते हुए ट्वीट किया है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।

क्या मायावती के वोट बैंक में सेंधमारी की होड़क्या मायावती की इसी सुस्ती का फायदा उठाने के लिए बाकी पार्टियां बेताब हैं? वरिष्ठ लेखक अजय बोस ने बताया कि नए दलित समाज में मायावती को लेकर कोई आशा नहीं दिखायी दे रही है। इस भावना को बाकी पार्टियां भी समझ रही हैं। इसीलिए मायावती के पीछे खड़ी होने वाली जमात को सभी झटकना चाहते हैं। यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा के चुनाव में दलित वोट बैंक पर सभी की नजरें हैं।

यदि दलित समाज में बसपा की शून्यता बढ़ती जा रही है तो कोई न कोई तो उसे भरेगा ही। ऐसे में बाकी पार्टियां अपने आप को दलित समाज के सामने विकल्प के तौर पर पेश कर रही हैं। यही कारण है कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने दूसरे पक्षों के नेताओं के रावदास मंदिर जाने पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस, भाजपा और दूसरी पार्टियों ने कहा तो हमेशा से ही दलित समाज के संतों की उपेक्षा की है लेकिन, अब राजनीतिक लाभ लेने के लिए नाटक करने कर रहे हैं।

संत रविदास का वाराणसी का मंदिर ही क्यों!
दूसरी बड़ी बात यह है कि इससे एक धार्मिक राजनीति का मोटिव भी पूरा होता है। इन दिनों की सियासत में राजनीति और धर्म एक दूसरे के साथ चल रहे हैं। ऐसे में संत रविदास राजनीतिक दलों की इन दोनों जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। वे दलित समाज के करीब भी दिखाई पड़ रहे हैं और मंदिर के प्रांगण में भी। प्रियंका गांधी तो पिछले साल भी संत रविदास के मंदिर गयी थी। इस बार तो बाकी धुरंधर नेता भी मत्था टेक रहे हैं। वैसे तो राजनेता उनके दूसरे मंदिरों में भी जा सकते थे लेकिन, वहाँ से धर्म का पुट वैसा नहीं दिखाई देगा जैसा वाराणसी का अपना आप दिखने लगता है।

यूपी में अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। सभी दलों के नेता जानते हैं कि दलित समाज अपनी ओर कर लेने से स्थिति बहुत बेहतर हो जाएगी। पूजा पाठ और लंगर के सहारे सत्ता के प्रसाद को सभी चखना चाहते हैं।







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